गुरुवार, 24 जनवरी 2013

हम क्यूँ कहें कि बिन तेरे मर जायेंगे
जिंदा रहकर उनकी ख़बर तो पायेंगे

बसंत की ख़ातिर पतझड़ों से ये कोफ़्त कैसी
शाख़ से टूटकर पत्ते किधर जायेंगे

सुना है रातें बड़े शहरों की सोती नहीं
कुछ सपने बिकने अँधेरों में आँयेंगे

औरों से इश्क़ की ये बात अच्छी है
हमसे भी बनाये रखो,सँभल जायेंगे

अब नाकें हो गयीं हिंदू मुसलमान आदमी की
साँस लेने किस हवा में जायेंगे

-संध्या यादव

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