मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

ख्वाब देखते हुए
मैंने तय किया था
उड़ान भरकर जिंदा रहेंगे
बेजान पर
और निर्जीव बना लूंगी इन
जिंदा पैरों को
ताकि बैठ सकूँ मैं  
बिजली के तारों पर
महसूस करूँ उन
दरख्तों का खुरदुरापन
जो साक्षी हैं सृजन के
और जब आकाश की
गहराइयों में गोते लगाते-लगाते
यदि थक जाऊं
तो उतर सकूँ
यथार्थ के  पथरीले धरातल पर
साथी! आसान नहीं
मगर फिर भी
प्रण किया था
अपने ही जिस्म के एक
हिस्से को निर्जीव बनाने का
ताकि बचा ले जाऊं
बाकि को ज़ख़्मी होने से
पर देखो
घृणा न करना
परख नहीं गर इनको
कोमल एहसासों की
क्योंकि जब पंख उड़ान भरेंगे
फिर से सपनों की
तिनका ये निर्जीव ही थामेंगे                                                                       -संध्या   
नाराज़ होने का वक़्त ही कहाँ मिला?
गोया उम्र गुजर गयी उनको मनाने में


आँखों को सोये एक अरसा हुआ
ज़िम्मा पलकों का हुआ थपकियाँ दिलाने का


होंठ खुलते भी तो कैसे पत्थरों की इबादत को
हाथों को आदत हुयी जिंदा बस्तियां जलाने की


हार मान मैंने सफर में  मगर शर्त है राही
कांटे पांव के न झुककर निकाले जायें                                                  -संध्या









सोमवार, 30 जनवरी 2012

आओ कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते

ग़म के आसुओं के रंग को 
उड़ जाने दो
थाम के हाथ एक दुसरे में 
खो जाने दो 
पैहरन के सब रंग फिज़ा में  
घुल जाने दो  
फिर से रंग दें कुछ नए पौधे 
आओ कोई ख्वाब बुने कल के वास्ते 

जाड़ों की धुप सी यादों में पका लें 
 ख़ुशी के सुनहरे धागे 
वक़्त की तकली 'पर  
नचायें  घुमाएं और मिट जायें 
आओ कोई ख्वाब बुने कल के वास्ते  

थाम कर नफरत की मशालें 
बस्तियां बहुत जलायीं
 मजहबों के नाम पर 
नींव कोई गहरी धरें दोस्ती के वास्ते 
आओ कोई ख्र्वाब बुने कल के वास्ते 

ये ज़मीं थी जो सरहदें तय कर लीं 
नदियाँ भी मोड़ दीं पर 
समंदर पे बस चले कहाँ 
आसमान की चादर तानें एक छत के वास्ते 
आओ कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते 

अब महल दुमहले लौटेंगे 
खंडहरों में वक़्त की चाल जानने 
गीली मिटटी है जोश हमारा 
आहिस्ता चाक घुमाओ नए सृजन के वास्ते 
आओ कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते 

पंख पसार दिए हैं मैंने 
सपनों के असीम गगन में 
हौसला तुम मेरा बनो उड़ान के वास्ते 
आओ कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते 

नैनों का ये अजब चलन है 
न कुछ तुम कहो 
चुप हम भी रहे परिचय के वास्ते 
आओ कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते 

जंग खा गयी ज़बान क्यूँ
माननीय बैठकों के फरमान पर
चलो हम तलवार बनें उस धार के वास्ते
आओ कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते


फासले हुए तो क्या
एक क़दम तुम चलो
एक क़दम हम चलें
और.........
जानकर लड़खडाएं एक दुसरे को थामने के वास्ते
आओ कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते


देशों के झगडे सुलझ रहे
विश्व की अदालत में
प्रेम पर कचहरी लगती
हमारी चाँद चौपालों में
उठे कि कोई ऊँगली जानिब हमारे
इससे पहले हम जवाब बनें उस सवाल के वास्ते
अओक कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते - संध्या

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

मौसम

जानती हूँ....

जब मैं तन्हां होउंगी 

मेरे इर्द -गिर्द 

बस तुम्हारी यादों का 

घेरा होगा 

तब मुझसे बतलाने को 

छा जायेगा 

तुम्हारे प्यार का मौसम 

दुनियाभर की बातें 

और चेहरों का दोगलापन 

घुटन सी जब होगी 

साँस लेने में 

बसंती हवाओं सा छा जायेगा 

तुम्हारे प्यार का मौसम  

जर्जर शाखों से लगे 

पीले पत्ते और उनकी खड़खड़ाहट 

मुंह चिढ़ाता बूढ़ा पीपल

 हरियाली को

सारे रंग फीके पड़ जायेंगे जब 

लहलहाती पीली सरसों सा 

छा जायेगा

तुम्हारे प्यार का मौसम

मेघ बनकर कब तक 

ढँक पाओगे मुझको 

मैंने भी नहीं  

ओढ़ा है आँचल इस उम्मीद में 

रिमझिम बूंदों से बरसोगे

और सोंधी मिट्टी सा महक उठेगा 

तुम्हारे प्यार का मौसम 

पता था हमेशा से ही

नहीं बांध सकूंगी तुम्हें

इसीलिए खींची थी लक्ष्मण रेखा 

अपनी इच्छा से चारों ओर

आंगन में लगी नीम भी 

हिस्सा है है उसका 

संसार बसाती उस पर गौरैया

 खुरदुरे तने पर चढ़ती अमरबेल सा

 छा जायेगा 

तुम्हारे प्यार का मौसम 

 इल्म है मुझे 

हमेशा नहीं रहेगा 

सिंदूरी शाम सा हसीन

तुम्हारे प्यार का मौसम 

लेकिन उम्मीदों की गांठ 

अब तक ढीली नहीं की मैंने 

गुलमोहर के ठूंठ सा ही सही 

तुम्हारे प्यार का मौसम

नहीं रखी है तुम्हारी कोई 

तस्वीर अपने पास 

 न ही जड़ा है कोई खाली फ्रेम

तुम्हारी यादों का दीवार पर 

हर बंधन से मुक्त 

झील के ऊपर उड़ते 

प्रवासी पंछियों सा 

छा जायेगा 

तुम्हारे प्यार का मौसम 

नहीं किया आज तक 

कोई सवाल  अपने शाश्वत प्रेम पर 

इन ऋतुओं के साथ 

रहेगा  किसी न किसी रूप में  

सदा मेरे पास 

तुम्हारे प्यार का मौसम      

------------------संध्या 




(ये कविता मैंने रश्मि जी की कविता से प्रेरित होकर लिखी है जो कुछ इस तरह है..)





तुम्‍हारे प्‍यार का मौसम

 

by Rashmi Sharma on Tuesday, 22 November 2011 at 14:39
बताओ न.....
सुर्ख फूलों से
कब तक भरा रहेगा
मेरा आंगन....
और कब तक गूंजेगामेरे कानों में
गौरयों के चहचहाने का स्‍वर...
क्‍या नीले आकाश में
हमेशा,
यूं ही अचानक उगा करेगा
मेरे सपनों का इन्‍द्रधनुष...
बताओ न
कब तक रहेगा
तुम्‍हारे प्‍यार का मौसम ??
बहुत अहम है
यह सवाल
क्‍योंकि‍
जब खत्‍म हो जाएगा
तुम्‍हारे प्‍यार का मौसम
सारे फूल
झड़ जाएंगे डालों से
और छोड़ जाएंगी
गौरैया भी
मेरा आशि‍याना....
तब
लगातार होगी बारि‍श
मगर सात रंगों का
नहीं उगेगा आकाशी इंद्रधनुष।
इसलि‍ए जरूरी है
कि‍ तुम्‍हारे प्‍यार का मौसम
जब खत्‍म होने वाला हो
उससे पहले
कुछ फूलों को
अपने आंचल में भर लूं...
पक्षि‍यों के कलरव को
यादों में समेट लूं...
और तुम्‍हारे प्‍यार के
सप्‍तरंग को
अपने कमरे की दीवारों पर
चि‍पका दूं
ताकि‍
चलती सांस तक
यह अहसास कायम रहे
कि‍ तुम्‍हारा प्‍यार
मौसम की तरह
नहीं बदला करता...वो पलता है
हमारे अंतस में
......शाश्‍वत
सूरज-चांद की तरह.....।

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

ऊ ला ला

आज के यंगिस्तान की खसूसियत है कि वो अपनी रियल लाईफ और फैंटेसी के बीच ज़बरदस्त घालमेल बिठा लेते हैं.प्रेमचंद और शेक्सपियर भले ही उन पर कोई प्रभाव न डालते हों लेकिन फिल्में उनकी लाईफ स्टाईल बनती हैं.आज सरेराह एक लड़के को छिड़ते देखा. ये हाथभर लम्बे बालों वाला राकस्टार टाईप था. लडकियों का एक झुण्ड उसे देखते ही चिल्ला पड़ा ऊ ला ला......जो सीन क्रियेट हुआ घूंघट की आड़ से बस पूछो मत.
                                                                        सुना है मनमोहन और गिलानी फिर से कतियाँ करने वाले हैं.अरे ! ओई तो समझाओ हमारे ओवर शालीन पी.जी. को की पूछें पाक से कितने आदमी पकड़े 26/11 वाले हमले के. आकिर कब तक इन्साफ के लिए बसंती बनकर नाचेंगे अमेरिका के सामने.सीते जैसी जनता बेचारी अघा गयी है इन नेताओं से.चुनाव आते ही सपने दिखाते हैं 60 महीनों में 60 तरीके से विकास कराने के.लेकिन इहर कुछ समय से जनता में भी कोलावरी डी मचा हुआ है.इसी का नतीजा है कि बीच-बीच में सुखविंदर जैसे दबंग लोग नेताओं कि ढिंक चिका कर देते हैं और थप्पड़ की गूँज कानों में कम लोकतंत्र के चौथे खम्भे में ज्यादा सुनाई पड़ती है,जो इंटरटेनमेंट,इंटरटेनमेंट और सिर्फ इंटरटेनमेंट पर टिका हुआ है.उधर जब से सरकार ने एफडीआई का फैसला लिया है संसद में खूब छम्मक छल्लो हो रही है.विपक्ष ऊपर से चिल्लाता फिर रहा है..लागा रे लागा नमक  एफडीआई का.अब नमक लग भी रहा है तो हुआ सस्ता तो होगा न ऊ ला ला....सरकार तो बदनाम हो गयी न   एफडीआई तेरे लिए...अब ये लो! मंहगाई डायन से जवान हो गयी है और जवान ही रहेगी.आर्थिक नीतियां उसका बोटेक्स जो करती रहती हैं ना ऊ ला ला...चाईना को भी चैन नहीं पड़ रहा.कब से अपना राग अलाप रहा है दलाई लामा तू मुझको उधर दई दे और बदले में सिक्किम अरुणाचल लई ले...इससे ज्यादा की उम्मीद करना अपनी ही बेइज्जती ख़राब करना होगा.पर्यावरण चिंताओं पर दरबान में दुनिया भर के देशों का जमघट लगने वाला है.एक राज़ की बात बताऊँ मुझे तो लगता है कोपहेगन वार्ता की तरह ये भी ऐवें-ऐवें ही ना हो जाये क्योंकि विकासशील देश बेहिचक कह रहे साडा हक़ एत्थे रख.विकास से समझौता नहीं भले दुनिया इधर से उधर जाये ऊ ला ला...पिछले एक हफ्ते में दो शादियाँ अटेंड की.शादियों में दो चीज़े ही खास लगी मुझे.एक तो वो डांस बारात का.जो कभी नहीं नाचा होगा वो भी खूब पैसे बटोरता है न्योछावर में.क्या ताल से नाचते हैं की छज्जे पर कड़ी एक लड़की तो देखे उन्हें.वो बात और है की मेकअप तले आंटियों की उम्र भी पता नहीं चलती ऊ ला ला ....और दूसरा एक गाना जो हा बारात में बजता है ये देश है वीर जवानों का. आज तक नहीं समझ पाई इसे क्यूँ बजाया जाता है.लेकिन इन दो शादियाँ में मुझे खास बात ये लगी की इस गाने की जगह कोलावारी डी और वही वो वाला गाना बज रहा था अपना ऊ ला ला......अगर आपको मेरी बातें पसंद ना आयीं हो तो!!! तो क्या कमेन्ट करियेगा कोलावरी डी स्टाईल में ऊ ला ला.....     

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

वो अकेला नहीं जो रूठा था ज़िन्दगी से 
फिर हड़ताल धडकनों की वक़्त पर है और मुफ़ीद भी 


तमाम उम्र सीधी राह चलने का सिला कुछ तो नहीं 
जब तिकड़मी बना तो शोहरत मिली और साथ उसका भी 


ढूंढ रहा था रेत में अजनबी क़दमों के निशां कब से 
जब थक कर गिरा तो पास दरिया था और समंदर भी 


कैफ़ियत तय हो गयी जब से इश्क की बाज़ार में 
दर्द जो उठा है सीने में अलग है और अजीब भी 


ज़ख्म मेरे जब रिसने लगे नज़्म बनकर 
दुनिया ने कहा वो बावला है और रक़ीब भी 


तलवारें खिंच गयी जिस फ़कीर की मय्यत  पर 
वो हिन्दू भी था और मुसलमां भी  


किसी की यादों को शिद्दत से प्यार करना 
ये हुनर है की वो भीड़ में है और तन्हा भी                                                        -संध्या 

सोमवार, 28 नवंबर 2011

आंख खोली नहीं फरेब पर उसके इस क़दर यकीन था 
मर गया भीड़ में वो शख्स जो दिल से हसीन था
मिलना हुआ नहीं कभी ये वक़्त की चाल थी   
अमीरों की बस्ती में चुना जिसे मौत ने एक गरीब था 
फूल भी खिलने लगे मिजाज़ मौसमों का देखकर 
ज़ख्मों में धंसे खंज़र पर निशान मिले उसके जो करीब था
नफरत मिली हमेशा ये काटों का नसीब है 
जाने क्या बात थी एक मुझे छोड़कर वो सारी दुनिया को अज़ीज़ था   
सजाए मौत मिली फिर से परिंदों को  इश्क की कचहरी में 
फैसला सुनाया उसी ने जो बयां से मुकर हुआ गवाह था                                              -संध्या