सोमवार, 30 अप्रैल 2012

जय बाघवातार जी


बाघ जी आप के शुभचरण क्या पड़े रहमानखेड़ा की धरती पावन हो गयी. पूरे 111 दिन का वास रहा इससे साबित होता है कि आप किसी ख़ासमखास उद्द्येश्य के साथ अवतरित हुए थे। बिना गड्ढे की सडक़ जैसे झलक दिखाकर गायब हो जाते थे। जब भी लगता की आपके होने का ये वहम भर है तो पोलियो के मामलों की तरह कभी यहाँ तो कभी वहां पाए जाते। वो कहावत भी तेल लेने चली गयी कि इलाका कुत्तों का होता है।। आपने घूम घूमकर अपना इलाका बता दिया। वो तो भला हुआ कि दिल्ली न गए वरना वो भी आपकी हो जाती। आप अवतरित न हुए होते तो पता भी न चलता कि बाघ बचे हैं। बाघ जी भला हो आपका। कुछ जनें बता रहे थे हमें कि आपके कारण उनकी जनरल नॉलेज बढ़ गयी। किताबों में पढ़ा था कि बाघ राष्ट्रीय पशु है आपकी कृपा से अब देख भी लिया। आपकी जि़म्मेदारी का भी जवाब नहीं बाघ जी,चुनाव से पहले आप अवतरित हुए,बाकायदा चुनाव करवाया और सरकार को कार्यभार दिलवा के गए हैं। आप तो नेता टाईप के शहंशाह निकले। अपनी आराम तलबी पर करोड़ों का खर्च करवाया। बाघावतार से ही वन विभाग कर्मचारियों का टैलेंट पता चला। बड़े दिनों से आपको शीशे में उतारने की कोशिश कर रहे थे पर चुल्लू भर पानी में उनके मुंह दिखाकर आपने औकातदर्शन करवाया कि बाघ पकडऩे चले हो फर्जी की मुठभेड़ करने नहीं। इसी बहाने हमारा हद निकम्मापन भी उसी चुल्लूभर पानी में उतराने लगा। टाईगर सफ़ारी के सपने उसी तरह से परवान चढ़े जैसे राहुल गाँधी के दम पर देश से गरीबी हटानी हो। वो तो भला हो कि आपने बैरक में लौट जाने का फैसला ले लिया वरना सेना बुलाने के आसार नजऱ आने लगे थे। हर तरह के आपरेशन में तो उसकी जरूरत पड़ती है। कभी प्रिंस आपरेशन तो कभी कोई और आपरेशन। कुछ दिनों में तो राशन की लाईन लगाने के लिए भी सेना न बुलानी पड़े। कईयों को आपने नक़ाब पहना दिया। जानवरों के नाम पर पेट भरने वाली पेटा दर्शन करने तक नहीं आई। पूनम पाँडे की तरह कोई चाल न चली सुखिऱ्यों में आने की ख़ातिर बस अपनी नैचुरल चाल चलते रहे। वनाधिकारी आपकी चरण रज माथे लगाते रहे और ताजे बासी के फेर में पड़े रहे। एक से एक पोज दिए कैमरे को, पर पिंजरे वाला दुर्लभ पोज 111 दिन बाद ही नसीब हुआ। रूपकली और चम्पाकली भी आयीं। पर बड़ा संयम बरता आपने भी दोनों के झांसे में नहीं आये। आपके बहाने नेताओं को भी कुछ एडवेंचरस करने का मौका मिल गया। जिनकी नेता बनते ही जान पर बन आती है, वो भी जनता की समस्या सुनने के नाम पर पिकनिक मना आये। अब जब भी बाघ आये तो घबराना मत क्योंकि किसी ख़ासमखास उद्दयेश्य के लिए अवतरित होगा। बाघ जी भला हो आपका जो हमारे ज्ञानचक्षु खोल दिए।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

प्लीज़ बनवा दीजिये न



बड़ा खऱाब समय चल रह है। अबकी बार शनि की साढ़े साती नहीं बल्कि मूर्तियों की साढ़े साती लगी हुयी हुई है। सडक़ पर पड़ी किसी भी चीज़ को हाथ लगाना मना है खासतौर पर पत्थरों को क्यूंकि धमाका हो सकता है। कोई भी पत्थर मूर्ति के रूप में निकल सकता है और पार्क के किसी पत्थर या मूर्ति को तो बिलकुल हाथ न लगइयो। पता चला हाथ यहाँ लगाया और दंगा पूरे देश में भडक़ गया। हमारी एक सलाह है आतंकियों को; बम धमाके करने की जगह बस जरा सा किसी मूर्ति को छेड़ दो फिर देखो। जब मूर्तियाँ निकलतीं हैं भारत भूमि से तब जो होता है वो दुनिया की किसी भी धरती पर नहीं होता। पहले मूर्तियाँ निकलती थीं तो मंदिर बनते थे इधर सुनने में आया है कि मूर्तियों के आस पास अस्पताल, कॉलेज बन सकते हैं। प्लीज़ हमारे यहाँ भी कोई मूर्ति लगवा दीजिये न।हम जनता बेचारी तरस गए हैं सस्ते और अच्छे अस्पतालों और स्कूलों को।।। जितने बीहड़ और गए गुजऱे टाईप के इलाके हैं सभी जगह बाबा साहेब, बहन जी और मान्यवर जी के बड़े वाले आदमकद प्लीज़ लगवा दीजिये न जिससे हमारी भी मुराद पूरी हो जाये। बड़ा अजीब शहर है जिंदा लोगों की परवाह नहीं और मुर्दों के नाम पर कटे मरे जाते हैं।रही बात मूर्तियों की तो इसकी गौरवशाली  परंपरा पाई जाती रही है हमारे यहाँ। राम लला वाली जन्मभूमि पर अस्पताल-स्कूल बनवाने की बात कब से चली आ रही है पर वहां के लिए किसी ने बीड़ा न उठाया। पार्कों में अस्पताल बनवाने की बात छिड़ी है, छिड़ी है तो बस छिड़ी ही रहेगी। जीते जागते इंसान नहीं मूर्तियाँ भी हिस्सा हैं राजनीति का तो मिर्ची तो लगनी ही थी ।मुर्दों की मूर्तियाँ होती तो न लगती। मूर्ति भी ऐसी वैसी नहीं है सिर्फ पर्स टांग रखा है पंद्रह लाख का। मुझे नए सीएम जी ने ये खबर दी। सीएम जी आपको कैसे पता कि मुख्य मंत्रियों के पर्स में इतने रूपये होते हैं। प्लीज़ हमें वो वाला पर्स दिलाइये नहीं बस दिखा दीजिये न। इतना बखत हो गया मुख्य  वाले मंत्री बने अब चुगली न करिए पिछली सरकार की। काम पे ध्यान दीजिये न। अब माया मोह छोडक़र जरा देख तो आईये पानी आ गया है शहर की टोटियों में.... कीड़ेवाला। अब बनवाने को सोच ही लिया है तो प्लीज़ पानी की व्यवस्था करवा दीजिये जिसे पीकर मरें न लोग, ऐसे अस्पताल बनवा दीजिये  जिसमें  डॉक्टर और दवाएं पाई जाती हों। ऐसे थानों की व्यवस्था कीजिये जहाँ के पुलिस वालों को कम से कम रिपोर्ट दर्ज करनी आती हों।कुछ नहीं तो मुख्यमंत्री जी प्लीज़ रहमान खेडा वाला बाघ ही पकडवा दीजिये न।मुख्य मंत्री जी सुन रहे हैं न आप प्लीज़ बनवा दीजिये....

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

आधी आबादी का सच


लखनऊ। 17 अप्रैल को मोहनलालगंज के अतरौली गाँव में घर के सामने खड़ंजे पर पगली (विक्षिप्त महिला) ने फूल जैसी बच्ची को जन्म दिया।  करीब दस साल पहले दिमागी संतुलन खऱाब हुआ तो उसने अपनी ससुराल छोड़ दी। विक्षिप्त अवस्था में आने के बाद ........ (यहाँ पर मैंने समाचार पत्रों में प्रयोग होने वाले शब्द दरिंदा, वहशी आदि का प्रयोग जानबूझ कर नहीं किया क्योंकि ये सब भी हमारे समाज का ही हिस्सा हैं और समाज को ये कहना शायद कई लोग पचा न पाएं) ने उसके साथ दुराचार किया। वह इससे पहले भी दो बेटों को जन्म दे चुकी है। एक बेटा अहिमामऊ व दूसरा नगराम में एक रिश्तेदार के पास है। गदियाना गाँव में ब्याही इस पीडि़ता के पति से तीन बच्चे भी हैं पर अफ़सोस सबने उसे ये दिन देखने के लिए छोड़ दिया।
19अप्रैल को सुलतानपुर में एक पिता ने अपनी सात माह की दुधमुंही बच्ची को पटक कर मार डाला।
हाल ही में इलाहाबाद के ममफोर्डगंज बाल निराश्रित गृह में बच्चियों के साथ वहीं  के कर्मचारियों ने दुराचार किया।
इसी तरह लखनऊ में ही एक पिता ने अपनी पुत्री की गला दबाकर हत्या कर दी क्योंकि लडक़ी गूंगी थी और उसके साथ दुराचार करने वालों का नाम बता पाने में असमर्थ थी।
20अप्रैल को ग्वालियर में चार बहनों ने अपने पिता के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी है कि उसके पिता उन्हें बार-बार बेचने की धमकी देते हैं।
20अप्रैल को ही गुडग़ाँव में एक व्यक्ति ने अपनी दो बेटियों सहित पत्नी का क़त्ल कर दिया फिर खुद को भी फंासी लगा ली। कारण नौकरीशुदा बीवी के चरित्र पर शक। 
18अप्रैल को बाराबंकी में एक पिता ने पुत्र के साथ मिलकर अपनी बेटी को मौत के घाट उतार दिया।
यही नहीं गुजरात में एक महिला ने बेटे की चाहत में अपनी ही बेटी को अपनाने से इंकार कर दिया।
20अप्रैल को पुरानी दिल्ली के लाहौरी गेट के रहने वाले जावेद तारिक ने अपनी बीवी इफ्तहयात को ज़हर दे दिया। उसका कुसूर बस इतना था कि उसने बेटी को जन्म दिया था। ये वही बड़े दिलवालों की दिल्ली है जहाँ की मुख्यमंत्री, देश को चलाने वाली सत्ताधारी पार्टी की अध्यक्ष, राष्टï्रपति और विपक्ष की कद्दावर नेता भी एक महिला हैं।  
                                                         ये घटनाएं महज़ बानगी भर हैं। अधिकतर हमारी संस्कृति के पुरोधा ये मानते हैं पश्चिमी सभ्यता औरतों को सम्मान नहीं देती।  ये घटनाएं हमारे उस सभ्य समाज की ‘जहाँ यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’ का गुणगान गाया जाता है। ये श्लोक मनुस्मृति से लिया गया है यानि किजहाँ नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। मनु स्मृति का ये श्लोक नारियों की पूजा की बात करता है तो हाँ बिल्कुल! हमारी संस्कृतिस्त्रियों की पूजा करती है। ये वही संस्कृति है जहाँ पैंतीस साल के आदमी की आठ साल की लडक़ी के साथ करवाना जायज़ ठहराती है, हाँ ये वही संस्कृति है जहाँ ये कहा जाता है कि रजस्वला होने पर यदि लडक़ी मां-बाप के घर रहे तो माता-पिता नर्क के भागीदार होते है और इसमें भी कोई शक नहीं कि ये वही संस्कृति है जिसमें  वेदों को पढऩे का अधिकार स्त्रियों को नहीं दिया गया था सिर्फ पुराण सुनने का अधिकार दिया गया था। आधुनिक काल तक जिस संस्कृति की सोच ये थी यदि स्त्रियों ने पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त कर ली तो वे विधवा हो जाएँगी और पति को अपने काबू में रखेंगी। जब भ्रूण हत्या प्रचलन में न थी यदि मान लिया जाये कि तब सौ में से पैंतालिस प्रतिशत महिलाएं थीं उनमें से बस यही तीन नाम लोपामुद्रा, घोषा,मैत्रेयी और अपाला मुख्य रूप से आते हैं जबकि ऋषि मुनियों के खाते में  बहुतेरे वेद पुराण आते हैं। जहाँ की आधी आबादी में से केवल तीन या चार नाम निकलते हैं। तो कल्पना कीजिये उस माली के लगाये सौ पौधों में से यदि सिर्फ तीन में फूल आते हैं तो माली बहुत अच्छा है या वो तीन जिन्होंने अपने संघर्ष से सब हासिल किया।  श्रेय किसे दिया जाए? जहाँ अहिंसा परमो धर्म है और इंसानियत व दान पुण्य के किस्से स्वर्ग नरक तय करते हैं उस देश में महिलाओं की हालत का अंदाजा आप सहज लगा सकते हैं।  मैं किसी नारीवादी की तरह सारा दोष पुरुषों पर नहीं मढऩा चाहती बल्कि दोष तो हमारी समाज व्यवस्था और ढोंगी संस्कृति का है। वह संस्कृति जिसमें सूर्यदेवता कुंती को दान स्वरूप कर्ण जैसा तेजस्वी योद्धा देते हैं, गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के रूप पर मोहित होकर इन्द्र छद्मवेश का मायाजाल रचते है, फिर अहिल्या गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बन जाती है और उद्धार के लिए मर्यादापुरुषोत्तम राम आते हैं, जिनकी खुद की पत्नी सीता को अग्नि परीक्षा के बावजूद महल छोडऩा पड़ता है। जहाँ स्त्री की कोख की उर्वरता को तो पूजा जाता है पर उसकी कोख को उस कटोरे से कम नहीं आँका जाता जिसके भरने और खाली होने में ज्यादा फर्क नहीं किया जाता। इस भारत भूमि पर उगे हर धर्म का सार इंसानियत है। यहाँ इंसानियत के नाते सडक़ पर बच्चा देती गाय के लिए ट्रैफिक जाम हो सकता है पर किसी पगली औरत पर किसी का ध्यान नहीं जाता जो साल-दर -साल तीन बच्चों की माँ सडक़ पर बनी हो। शायद यहाँ औरत को सिर्फ मादा समझा जाता है। हमारे समाज में सभ्यता के पैमाने कपड़ों से तय किये जाते हैं। मैं ये नहीं कहती कि औरतें सिर्फ छोटे कपड़े पहनेें या फिर शराब या सिगरेट पीना शुरू कर दें लेकिन यदि बराबरी की बात छिड़े तो फिर सब पर लागू हो। यदि जींस या छोटे कपड़े पहनने से अश्लीलता को बढ़ावा मिलता है तो फिर उन पुरुषों को क्या कहा जायेगा जो कभी भी कहीं भी खड़े होकर निपट लेते हैं। औरतों के ऊपर मान-मर्यादा की लिजलिजी केंचुली किस कदर चढ़ा दी गयी हैं इसका नमूना हमारे समाचार-पत्रों के उस शीर्षक से पता चलता है जिसमें चार बच्चों की माँ प्रेमी संग फरार हो जाती है। कहने को तो अमृता प्रीतम जैसी स्त्रियों को भी ये समाज पचा नहीं पता जिन्होंने साहिर और इमरोज़ के साथ अपने संबंधों को समाज के सामने स्वीकार किया।  एक आम शादीशुदा महिला प्रेमी संग फरार ही हो सकती है। आम तौर पर ये खबरें कभी संज्ञान में नहीं आतीं कि चार बच्चों का बाप फरार। यहंा एक मां पुत्र की लालसा में अपनी ही बेटी को अपनाने से इनकार कर दे और बच्ची सात दिन तक भूखी  रहती है। यदि जानवरों के बच्चों के साथ भी थोड़ा समय बिताया जाए तो लगाव हो जाता है तो फिर बच्चियों को मार देने वाले किस श्रेणी में आते हैं ये आप सब तय करिए? सिर्फ दो धड़ों में बंटा हमारा समाज तीसरे रास्ते के लिए आसानी से तैयार नहीं दिखता। होना तो चाहिए कि ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाये जिन्होंने कभी दहेज़ लिया हो या अपनी बहू की हत्या की  हो या गर्भ में पलने वाली अजन्मी बच्ची को मारा हो। क्योंकि जब तक सामाजिक बहिष्कार नहीं होता तब तक ऐसे लोगों को सबक नहीं  सिखाया जा सकता। अगर ऐसी घटनाओं को रोकना है तो हमें संस्कारों की पाठशाला अपने घर से शुरू करनी होगी। सिर्फ बेटी को बचाव के तरीके सिखाने से काम नहीं चलेगा। बेटों को भी वो संस्कार देने होंगे। नारीवादी सिर्फ महिलाएं ही क्यूँ होती हैं नारीवादी पुरुष बनने से अगर कोई बदलाव नजऱ आता है तो इसमें हजऱ् क्या है?

हर लम्हा है ज़िन्दगी

आज सुबह उठी तो वही पुराना सूरज छत पर आ चुका था, अकड़ दिखाते हुए चाँद से जाने को कह रहा था। मनीप्लांट पर कोयल बेमन कूक रही थी और गौरैया भला क्यूँ आती आँगन में जब हमने जाल डाल रखा है उस पर। रोज की दौड़ भाग फिर से शुरू। मम्मी की नींद चाय की भाप में उबल चुकी थी और आटे की लोई के साथ उनकी जम्हाईयाँ मिल गयी थीं। अपनी उसी पुरानी सायकिल से ऑफिस के लिए निकल पड़ी। मेरी यात्रा के साथी रास्ते के मरियल कुत्ते रात की ड्यूटी पूरी करके आराम फरमा रहे थे, गायें चारा खाकर नेताओं की तरह बड़ी तन्मयता से जुगाली कर रही थी। मुझे उम्मीद थी कि पुरानी सायकिल से निकला संगीत कुछ नया जरूर जरूर देगा। सडक़ के दोनों ओर छोटे -छोटे बच्चे टाट की बोरी पर खीरे-ककड़ी की अपनी दुकानें सजाये थे। इन्हें देखकर अक्सर मन में खय़ाल आता है कि क्यूँ असल भारत के बच्चों को आईआईएम या विदेशी कॉलेजों से प्रबंधन की डिग्री की जरुरत नहीं होती। दरअसल एक वक़्त की रोटी और अभावों में जिंदगी जीने का हुनर ये बचपन से सीख जाते हैं अगर इन्हें मौका मिले तो धीरूभाई अम्बानी की फ़ौज खड़ी हो जाये।
 बंद रेलवे क्रॉसिंग अक्सर मेरे धैर्य का परीक्षण करती है। अगर गौर करें तो मिनी इण्डिया के दर्शन रेलवे फाटक के दोनों ओर खड़ी भीड़ में हो सकते हैं और आँखों के सामने से गुजऱती ट्रेन यक़ीनन आपको इनके्रडिबल इण्डिया का भान कराएगी जिसके हर डिब्बे में अलग तरह के लोगों का बसाव मिलेगा, ट्रेन की खिड़कियों से लटके दूध के कैन और खिड़कियों से लटके सफऱ करते लोग। इतना रोमांच तो एवरेस्ट की चढ़ाई में भी नहीं मिलेगा। बख्शी का तालाब से टैक्सी लेते समय एक नजऱ तालाब पर चली ही जाती है। गाँव के बूढ़े पीपल और घर के बुजुर्गों की तरह सबको पहचान देने वाला आज यह तालाब चुपचाप अकेले सिसकियाँ लेता है। टैक्सियों में बजने वाले गाने कई बार मुझे अजनबी भाषा के लगते हैं लेकिन संगीत की कोई अलग भाषा नहीं होती। सहित्य और सिनेमा किसी भी समाज और उसके देशकाल का आईना होते है।
साहित्य और सिनेमा ऐसी दो विधाएं हैं जिनके आधार पर किसी भी देश और समाज के विषय में जाना जा सकता है। दोनों ही उसके बौद्धिक विकास और रचनात्मकता का पैमाना होते है। जहाँ एक ओर फि़ल्में ओर साहित्य उस समाज को समझने का बेहतर उपाय हैं, वहीं दूसरी ओर किसी भी परिस्थति या मनोदशा को दर्शाते है।   रंग दे बसंती फिल्म के ‘थोड़ी सी धूल..’ गाने ने जेनरेशन नेक्स्ट के इस अनोखे देशप्रेम का सबको दीवाना बना दिया था। पीपली लाईव की ‘महंगाई डायन’ ने उसे संसद का सबसे लोकप्रिय विषय चर्चा के लिए बना दिया। महंगाई डायन हमेशा से ही समाज में थी लेकिन इतनंी लोकप्रिय पहले कभी नहीं हुयी थी। इन सब उदाहरणों के पीछे का आशय यह है कि हर फिल्म या गाना अपने समय के समाज, परिस्थितिकाल, और मनोदशा का पोषक होता है। फिर चाहे वो हिंदी सिनेमा हो या भोजपुरी या फिर तमिल।
सबके पीछे एक सन्देश या फिर यूँ कह लें कि पूरी कि पूरी विचारधारा छिपी हुयी होती है। इसका सबसे सटीक उदाहरण है टैक्सियों में बजने वाले गाने जो कॉलेज गोइंग्स में टेम्पो टाईप के नाम से मशहूर है। इसी तरह का एक टेम्पो टाईप है ‘अरे रे मेरी जान सवारी, तेरे कुर्बान सवारी..’ और आगे का पूरा गाना टैक्सी चालकों कि मनोदशा और उनसे कि जाने वाली पुलिसिया वसूली को बड़ी ही साफगोई और चालाकी से बयां कर जाता है। ये बताता है कि कैसे पुलिसिया वसूली की खीज वो सवारियों को भूसे के मानिंद ठूंस के निकालते है। भले ही इण्डिया में दोपहिया और चारपहिया वाहनों का बाज़ार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा हो लेकिन अब भी ये टैक्सियाँ ही कई शहरों में एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँचने का एकमात्र जरिया लाखों लोगों के लिए है।  यानि कि अब हमें ये मान लेना चाहिए कि ये टेम्पो टाईप सिर्फ हास परिहास का विषय नहीं है बल्कि इनका भी अपना एक टाईप है. जो बहुत हौले से अपनी बात समाज के हर वर्ग तक पहुंचा रहा है। मजेदार बात यह है कि ये भी भारतीय संविधान का अपना तरीका  है जो सभी को अपनी बात कहने की आज़ादी अपने टाईप से देता है। ट्रकों पर लिखे संदेशों के बाद अब ये टेम्पो टाईप भी अपना टाईप बताते हुए ये सडक़ों पर दौड़ रहे है।
  टैक्सी के थोड़ा सा रुकते ही छोटे छोटे बच्चे अपने कटोरे में किसी एक देवता की तस्वीर लिए ‘भला होगा’ कहकर पैर पकड़ लेते हैं तो कभी जोड़ा बनाने लगते है। इन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अकेले ही सफऱ कर रहे है।  दिन के साथ इनके कटोरे के देवता भी बदल जाते हैं और कभी कभी तो एक लोहे के टुकड़े भर से भी काम चल जाता है। तभी एक बच्चा ठन्डे पानी का पाउच हाथों में लिए टैक्सी में चढ़ता है। पूछने पर कि कौन सी क्लास में पढ़ते हो बिना देर किये जवाब देता है हम पढ़ते नहीं दीदी पानी बेंचते है। इसके आगे कुछ भी बोलने को बचा ही नहीं था मेरे पास। ये तो बस कुछ दूरी थी जिसने इतना कुछ सिखा दिया। ऐसे तमाम किस्से बिखरे पड़े हैं हमारे चारों ओर पानी बेचने वाले, सडक़ किनारे गृहस्थी जमाने वाले, सिर पर छ: ईंटें रखे और पीठ पर बच्चा बांधे काम करती बिलासपुरिया औरतें कभी महसूस कर के देखिये इनकी जि़न्दगी को, फिर जीवन दर्शन की खोज में किसी आध्यात्म नगरी नहीं जाना पड़ेगा।

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

शहीदों की चिताओं पर नहीं लगते हैं अब मेले..



 वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...  अमर बलिदानी रामप्रसाद च्बिस्मिलज् की यह पंक्तियाँ हमारी स्वतंत्रता के राष्ट्रयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति  देने वाले लाखों अमर बलिदानियों की पूज्यनीय अभिलाषा की प्रतीक हैं लेकिन इन अमर शहीदों की इस अभिलाषा पर  श्रद्धासुमन अर्पित करने की बजाय हमने उन पर अंगारों को सजाया है.स्वतंत्रता की आधी सदी बीतने के साथ ही हमने उन शहीदों को भुलाने की कृतघ्नता का शर्मनाक परिचय दिया है जिनके रक्त में डूबे अथाह अतल बलिदानों के ऋण से यह देश अनंत काल तक मुक्त नहीं हो सकता । हमारी सरकारें और व्यवस्था हर चीज़ की कीमत देना जानती हैं चाहे आतंकी घटनाओं में मारे गए लोग हो या किसी रेल दुर्घटना के शिकार हुए लोग। राहत कार्य बाद में चलते हैं और मुआवज़े आगे। सरकार के इस रवैये का शिकार सिर्फ आम आदमी ही नहीं बल्कि आज़ादी की लडाई में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले शहीद, स्वतंत्रता सेनानी और युद्ध में जान गंवाने वाले सेना के जवान भी हैं। भारत पाक युद्ध में दुश्मन के छक्के छुड़ाने वाले वीर अब्दुल हमीद हों या कारगिल में वीरगति पाने वाले कैप्टन मनोज पांडे इन्हें याद करना तो दूर शहीद दिवस पर इनकी प्रतिमाओं पर जमी धूल तक नहीं झाड़ी जाती।
                गत आठ अप्रैल को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आज़ादी का पहला बिगुल फूंकने वाले शहीद क्रांतिकारी मंगल पांडे की पुण्यतिथि थी और भगत सिंह ने असेम्बली में बम फेंका था। इसी दिन देश को राष्ट्रीय गीत च्वन्दे मातरमज् देने वाले बंकिमचंद चट्टोपाध्याय की सुध लेना भी भूल गए। व्यवस्था के चौथे स्तम्भ का ढोल पीटने वाला खुद मीडिया इस कतार में सबसे आगे खड़ा है। आईपीएल के चौके छक्कों, ऐश्वर्या की बेटी, बिग बी की बीमारी, और सनी लियोन की ख़बरों की चाशनी चाटने वाले मीडिया में भी इन सबको दो पंक्तियों की श्रद्धांजलि तक नहीं अर्पित की। ये मीडिया रसूखदारों के उठावनी सन्देश तो पैसे लेकर सेंटीमीटर्स में छाप सकता है पर शहीदों के लिए एक कॉलम की खबर लिखने में कांखने लगता है। कल तेरह अप्रैल को जलियांवाला बाग़ हत्याकांड की 93वीं बरसी थी। इस दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में सैकड़ों  निहत्थे लोगों पर ब्रिटिश शासन के अधिकारी आर ई एच डायर ने गोलियां चलाने का निर्देश दिया था जिसके फलस्वरूप लगभग चार सौ लोग मारे गए थे और बारह सौ से अधिक घायल हुए थे। क्रूरता की सभी हदें पार करते हुए इस अँगरेज़ अफसर ने बाग़ से निकलने के एकमात्र रास्ता भी बंद करवा दिए था जिससे कई लोग अपनी जान बचाने के लिए बाग़ में बने एक कुएं में कूद गए थे। हिंदी के एक दो समाचार पत्रों को छोडक़र अन्य किसी ने इसे खबर तो जाने दो गॉसिप के लायक भी नहीं समझा और अंग्रेजी के अखबार जऱदारी यात्रा, अन्ना हजारे,ओबामा मेनिया और विदेशी नीतियों के दिवास्वप्न में खोये रहे हैं। आखिर ये किस जिम्मेवारी के वहन का दावा ठोंकते रहते हैं? सच पूछिए तो गलती हमारी भी है हम राखी सावंत और ब्रिटनी के बारे में तो पल पल की खबर रखते हैं पर शहीदों के नाम पर बगलें झाँकने लग जाते हैं।  राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी ठेकेदार पार्टी अपने नए अध्यक्ष की ताजपोशी पर बधाई गीत गाने में व्यस्त थी।सत्तारूढ़ समाजवादी खेमा एक मौलाना की क्रोधाग्नि शांत करने के लिए उसके दामाद के राजनीतिक महिमामंडन में मिली सफलता पर मुग्ध था।देश को आजाद करने का दावा करने वाली देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी उत्तर प्रदेश चुनावों में मिली माट पर दिल्ली में मातम मना रही थी। राजनीती की मंदी में अपनी फुटकर दुकानें संजोये बैठे छुटभैये राजनीतिक गिरोह सत्तासुख की बन्दरबाँट से खुद के बहार के ग़म में डूबे रहे। किसी को भी इनकी याद नहीं आई।
                                                   हम बस घरों में बैठकर भ्रष्टाचार का राग अलाप सकते हैं, बहुत हुआ तो किसी रामलीला मैदान में जाकर पिकनिक मना आयेंगे इससे ज्यादा हमारे बस का है भी नहीं। वीर हमीद की विधवा पेंशन के लिए सालों भटकती रहीं, मनोज पांडे के माता- पिता के पास अपने जिगर के टुकड़े की यादों के सिवा कुछ भी नहीं है। अभी पिछले साल का ही वाकय़ा है जब वीरता के तमगों को भूतपूर्व सैनिकों और शहीदों के परिजनों ने राष्ट्रपति को ये कहकर लौटा दिया कि इन्हें गिरवी रखकर सरकार पेंशन की व्यवस्था कर दे। किसी देश के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात भला और क्या हो सकती है? वो तो भला हो आमिर खान का जो रंग दे बसन्ती जैसी फिल्में बनाकर हमें कुछ याद दिला देते हैं। वरना हमारे पास उनके बलिदान के बदले बसों और ट्रेनों में आरक्षित कुछ सीटों औरएकाध चौराहों के नाम के सिवा कुछ भी नहीं है।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

ख़ामोशी से किये गए काम इतिहास रचते हैं




 जो दी तोर दाक शोने केयू न अशे तोबे एकला चलो रे....यानि तेरी आवाज़ पे कोई न आये तो फिर अकेला चल रेज्। रविन्द्रनाथ टैगोर जी को ये पंक्तियाँ लिखे एक सदी से भी ज्यादा समय हो चुका है लेकिन इनका असर आप लखनऊ के कुकरैल बंधे के पास बसे अकबरपुर में साफ़ देख सकते हैं।  यहाँ अकेले चलने का बीड़ा उठाया है अनीता तिवारी और निरुपम मुखर्जी ने और इनके साथ चल रहे हैं डेढ़ सौ से भी ज्यादा नन्हे कदम जो तमाम दुश्वारियों के बावजूद किताबें थामे हैं। अनीता और निरुपम पिछले बाईस सालों से यहाँ के गरीब बच्चों को बिना रूपये लिए पढ़ा रहे हैं। लखनऊ यूनिवर्सिटी में एमए की छात्रा रहीं और एनजीओ नेटवर्क सोसाईटी में नौकरी कर चुकीं अनीता एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में जब अकबरपुर आई तो उन्हें अंदाज़ा तक नहीं था कि यही बस्ती एक दिन उनके लिए परिवार बन जाएगी।  जितनी उनकी होली है उतनी ही ईद । तीन लड़कियों से शुरू हुई उनकी अनोखी क्लास में आज डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं ।  इनकी पढाई कुछ लड़कियों की तो शादी भी हो चुकी है।  अनीता बताती हैं कि लड़कियों की पढाई के लिए उनके माता-पिता को राजी करना आसान नहीं था।  लेकिन हमने हार नहीं मानी।  हमारी ईमानदारी और लगन देखकर लोगों ने यहाँ स्कूल चलाने की अनुमति दे दी। ज़्यादातर हमारा प्रयास यही रहता है कि ये बच्चियां खुद अपने माता पिता को राजी करें। यहाँ के अलावा अनीता और निरूपम एल्डिको ग्रीन पार्क और जीपीओ के पास भी पढ़ाते हैं। निरुपम बताते हैं कि झुग्गियों और हजरतगंज में गाडिय़ों के शीशे साफ़ करने वाले बच्चे हमारे लिए बड़ी चुनौती थे क्यूंकि इनमें से कई ऐसे थे जो आयोडेक्स ब्रेड में लगाकर खाते थे, कोई फेविकोल के दस ट्यूब रोज़ खाता था,तो कोई पेट्रोल सूंघ कर नशा करता। इनमें से कई मोबाईल चोरी का काम भी करते थे। ऐसे बच्चों को हम सही दिशा देकर ऐसे रोजगार में लगानें की कोशिश करते है जिससे वे अपनी आजीविका चलाने के साथ साथ पढ़ाई भी कर सकें। हमारे पढ़ाये ऐसे कई बच्चे हैं जो आज चाय, पान- मसाला और जूस की दुकान चला रहे हैं और कुछ लखनऊ केअच्छे मोटर मैकेनिकों में से हैं। जिस दुकान पर इन्होंने काम सीखा आज उसके मालिक हैं और यहाँ से पढक़र गए बच्चों को भी काम सिखा रहे हैं। ये वही बच्चे हैं जो कभी जेबकतरे हुआ करते थे। अनीता बताती हैं कि हम इन बच्चों को कोई सर्टिफिकेट नहीं दे पाते इसलिए एक से कक्षा पांच तक के बच्चों का प्राईमरी स्कूल में पढ़ाई करते हैं और बाद की पढ़ाई लडक़े राजकीय इंटर कालेज और लड़कियां करामत इंटर कालेज में पूरी करती हंै। कुछ लड़कियों ने इंटर पास किया है। अनीता तिवारी बाराबंकी के कोटवाधाम की और निरुपम मुखर्जी बंगाल के चौबीस परगना के रहने वाले हैं। निरुपम जी सरकारी कर्मचारी भी हैं। भविष्य में एनजीओ बनाने के सवाल पर कहते हैं कि हम घूस नहीं दे सकते और चोरी नहीं कर सकते और जो ये नहीं करता वो एनजीओ कभी नहीं चला पायेगा। हमने लोगों से कभी कोई मदद नहीं मांगी पर कुछ ऐसे लोग हैं जो बिना नाम बताये हमारी मदद करते हैं। लोग हम पर इतना विश्वास इसलिए करते हैं क्यूंकि हमने इनसे कभी झूठ नहीं बोला, इन्हें अपने जैसा बनाने के बजाय खुद इनके जैसे होकर इन्हें पढऩे की कोशिश की। अविवाहित अनीता कहती हैं कि भगवान से यही प्रार्थना है कि जब तक जि़न्दगी है इन बच्चों को पढ़ाती रहूँ।
                                                                     अनीता और निरुपम हमारे लिए एक मिसाल हैं जिन्होंने मीडिया की चकाचौंध से दूर एक स्वार्थरहित दुनिया बनाई है। इन्होंने साबित कर दिखाया है कि बदलाव कभी भीड़ इक_ी करने से नहीं आता । धारा के विपरीत बहकर ख़ामोशी से किये गए काम इतिहास रचते हैं।     

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

ज़रदारी का मनमोहन को प्रेमपत्र



मेरे अजीज़ मनु,
                         सात सालों की जुदाई आसान नहीं थी. आखिर मैं भी अपने कई पतियों वाले देश में सबकी नजऱों से बचकर दरगाह के बहाने आ ही गया. यहाँ प्रेम की भाषा कोई नहीं समझता बस गोलियों और हाफिज़ की भाषा सभी पाठ्यक्रमों में अनिवार्य कर दी गयी है.  मेरी हालत तुमसे बेहतर भला कौन समझ सकता है मैं बस दिखाने भर का पति  रह गया हूँ असली पति तो सेना है जिसने मेरी सौतन बनकर जीना मुहाल कर दिया है. इधर हथियारों में काफी खर्चे बढ़ गए सुलह के बावजूद अमेरिका ने भत्ता देना बंद कर दिया है. सोचता हूँ मेरी चीनी और तुम्हारी चाय से कुछ दिन का गुज़ारा तो हो ही जायेगा. अमेरिका के सहयोग से हमारे हाफिज़ को इक्यावन करोड़ का इनाम हुआ है. यूं तो मेरे पचहत्तर प्रेमी हुए हैं पर चीन ने मुझे जो दिया और जो दे रहा है वो हर किसी से छुपा हुआ है. उसने हम दोनों के मिलन में बड़ी मदद की है. तुम्हारे साथ बंद कमरें का डिनर अपनी यादों में संजो के रखूँगा पर हमारा अकेलापन सीमा- रेखा, शांति और अमन को नहीं भाया वहां भी चले आये खलल डालने. मेरे अज़ीज़ तुम्हारी  मजबूरियां भी मैं समझता हूँ इसलिए अपना समझकर तुमसे दर्द बाँटने चला आया. ख़ैर बाकी सब खैरियत है उम्मीद करता हूँ आप भी कभी खरियत से हो जाओगे.
                                                                                                 -तुम्हारा जऱदारी