बुधवार, 17 अगस्त 2011

मुझे क्या चाहिए......

बन के क्या हासिल उसे तुलसी किसी के आँगन की,
कैक्टस मरू  के आशावान चाहिए,

पुलिंदा हूँ किसी की झूठी शान का,
तो मन पर मेरे पहरेदार चाहिए,

इल्ज़ाम लगाते हैं लोग मोहब्बत का,
तो दुनिया! मुझे इंसान चाहिए,

गूंजता है रह-रहकर शोर मेरे कानों में मकानों के टूटने का,
सुकून से भरा घर आलीशान चाहिए,

मानते हैं ज़श्न औरों की बर्बादी पर..ऊंची दीवारों के पीछे रहने वाले लोग,
ऐसी ख़ुशी से भली मौत ग़ुमनाम चाहिए, 

छूटती हैं जडें पेड़ के ज़्यादा बढ़ने से,
तो क़िस्से बर्बादी के मेरी तमाम चाहिए,

क़ाफ़िर हूँ ग़र इस समाज की,
तो मुझे इससे बहिष्कार चाहिए,

नज़र का मेरी दायरा असीम है,
पूछे न मुझसे कोई 'क्या चाहिए' 

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

कौन हूँ मैं?

कांटे की नोक सी चुभती सर्द हवाएं,
वो ठंडक के दिनों की गुनगुनी धुप हूँ मैं,

नए सृजन की जो नींव रखी,
तुम्हारे घोंसले का पहला नीड़ हूँ मैं,

नंगे पांव टहलकर ज़रा महसूस करना,
मुलायम घास पर ओस की बूँद हूँ मैं,

बादल जब बरसकर चले कहीं और जायें,
पारिजात की कोपलों पर ठहरी बूँद हूँ मैं,

फेरकर हाथ देखो,
तुम्हारी ही तस्वीर पर वक़्त की धूल हूँ मैं,

टेबल पर पड़ी पुरानी डायरी में,
वो सूखा फूल हूँ मैं,

कंपकपाते होठों से तुम्हारे,
निकला गीत हूँ मैं,

जेठ की दोपहरी में,
थोड़ी सी छाँव हूँ मैं,

घाव दिखते नहीं पर,  
तुम्हारे दर्द की वो पहली पीर हूँ मैं,

और क्या कहूं तुम्हें अब?
आंखें बंद करके सुनो तो,

तुम्हारी सांसों की मद्धमगूँज हूँ मैं,
देखो अब न कहना तुम................
की कौन हूँ मैं?  

ये मीडिया वीडिया क्या है.............

अभी कल की ही बात ही कि मेरे पड़ोसी सवेरे-सवेरे ही मेरे घर आ धमके. अब इतनी मंहगाई में अतिथि बिलकुल अमेरिका सरीखा ही लगता है कि कब, कहाँ, किस वक़्त आ धमके और चाय-पानी पर हक जमा दे. पड़ोसी  महोदय ने बड़ी रपटीली निगाहों से पूछा- और..चाय-वाय पी जा रही है.ऐसा लगा  कि मानो अमेरिकी सील कमांडो ने मिसाइल दाग दी हो जिसे  न उगला जा रहा था और न निगला.बिल्कुल पी.एम. वाली स्टाइल में हामी भरी. अब वो थे कि बोलते ही चले जा  रहे थे और हम नाटो देशों की तरह उनके पीछे-पीछे हाँ में हाँ मिला रहे थे.उनका बात  करने  का अंदाज़ ऐसा कि हमारे बड़े-बड़े न्यूज़ एंकर  भी मात खा जायें.पड़ोसी महोदय आगे बोले- और बताएं कैसे  हैं आप? हमने सोचा कि आपसे बातें-वातें हो जाएं. बच्चे-वच्चे कैसे हैं? और भाभी जी भी अच्छी हैं. वो कुछ बोलते कि हमने पहले ही तपाक से ज़वाब  देते  हुए कहा. एक के बाद एक सवालों कि मिसाइल दागे जा  रहे थे. ऐसा लग रहा था कि जैसे पाकिस्तान भी वही हों और इण्डिया भी वही हों.ज़वाब मुझसे ही मांगे जा रहे थे जैसे मैं कोई विकिलीक्स हूँ जो क्लिक करते ही दुनिया भर में हल्ला हो जायेगा.सरकारी स्कूल के मास्टर की तरह उन्होंने मुझसे पूछा- गरीब? ज़वाब था किसान. हत्या? सचान. इसके बाद तो शब्दार्थ का ऐसा शास्त्रार्थ चला कि पडोसी जी कालिदास बन गए और हम विद्योत्मा कि तरह ताकते रहे.आत्महत्या? जो रखता है ईमान. ढोंगियों के बीच संत?निगमानंद. नए पैकेट में माल पुराना? रामदेव का योग-ख़जाना. मांगों को मनवाना? वही अनशन का ढोंग पुराना. अब आगे वाही हुआ जो अक्सर हमारी भारतीय बहसों में अक्सर हुआ करता है. बात शुरू रामायण से हुयी थी और पहुँच महाभारत तक गयी. अब  वे हर किसी की बखिया उधेड़ कर रखने वाले मीडिया पर  आ टिके थे. जैसे ही उन्होंने मीडिया की पूँछ  पकड़नी चाही मैंने झट से जवाब दे डाला- महोदय जी अब तक जितने शब्द अपने पूछे वो मीडिया था और अर्थ वीडिया.फिर हल्के से हम वीडिया की स्टाइल में अपना बोरिया-बिस्तर समेत कर नौ दो ग्यारह हो लिए.    
        


   

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

                                    काश..........कोई स्लट-वॉक इधर भी होता  

 स्लट वॉक यानि कि अपने आप में एक बेशर्मी मोर्चा (अगर हिंदी में इसका अनुवाद किया जाये तो कुछ ऐसा ही अर्थ निकलता है) देश की राजधानी दिल्ली में निकालने  का ऐलान  कुछ महिलाओं ने कर दिया है. अपने अधिकारों कि मांग के लिए ये एक अलग तरीके का विरोध प्रदर्शन है.मैं यहाँ कोई स्त्रीवादी बात या किसी अन्य का विरोध करने नहीं जा रही हूँ बल्कि इस घटना के सहारे उस हकीकत कि ओर ध्यान खींचना चाहती हूँ जो हमारे समाज में बस यूं ही हो जाया करती हैं.
                                                                             बिहार की अंशुमाला ने आज से दो साल पहले ये सोचा भी नहीं होगा कि जिस सफलता  कि ओर वह इतनी तेज़ी से कदम बढ़ा रही है,नियति उसे ऐसे मोड़ पर ला कर पटक देगी कि खुद के सहारे दो कदम भी चलना दूभर हो जायेगा. दिल्ली यूनिवर्सिटी से  एम.ए और एम.फिल., पटना विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातक और आकाशवाणी की 'बी' ग्रेड कलाकार, युवा लोकगायिका अंशुमाला आज अपनी मौत का मर्सिया खुद पढ़ने को मजबूर है. जो बिहार कभी अंशुमाला की गायिकी के दम पर इतराता फिरता था, आज उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.जब भी ज़रूरत पड़ी अंशुमाला ने बिहार से लेकर,मिरांडा कॉलेज,बाल भवन,श्रीराम सेंटर और नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा तक हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज की. जहाँ अंशुमाला की लोक  गायिकी पर हजारों तालियाँ बज उठती थीं. आज कहाँ है वो तालियों की गड़गड़ाहट,तारीफों के पुल बांधते लोग? उसका हौसलाफज़ाई करने वाली वो बड़ी-बड़ी हस्तियाँ? वो सेमिनार और वो संस्थाएं जो अपने कार्यक्रमों में अंशुमाला को आमंत्रित कर स्वयं को धन्य समझते थे. २७ साल की इस छोटी सी उम्र में अंशुमाला ने वह दौर भी देखा जब उसके प्रसंशकों की फेहरिस्त में बिहार के राज्यपाल से लेकर पी. एम. मनमोहन सिंह की पत्नी गुरुशरण कौर और पूर्व राष्ट्रपति  ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तक शामिल थे. जमशेदपुर में आयोजित आल इंडिया यूथ फेस्टिवल शायद अंशुमाला की ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पलों में से एक होगा जिसमें नाना पाटेकर ने भी उसकी गायिकी की सराहना  की थी.लेकिन ये सब उसका बीता हुआ कल था.जो हकीक़त है वो उसका आज है. 
                                                                               अंशुमाला ने इतनी सफलता हासिल करने के बाद भी अपने माता-पिता की बात मानी और उनकी पसंद के लड़के से शादी की.दिल्ली और पटना को छोड़ वह अपने ससुराल आ गयी और किस्मत ने यहीं से अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. ससुराल में रियाज़ का माहौल नहीं था और शायद सुरों के बिना वह अधूरी थी.प्रेग्नेंट होने के बाद डिप्रेशन में आ गयी. बच्चे के जन्म के साथ ही उसकी एक किडनी ख़राब हो गयी. ये बात अंशुमाला ने अपने माता- पिता को भी नहीं बताई. अपनी सारी तकलीफों को को समेटे वो घुट- घुट कर जीती रही ,लेकिन पिछली जनवरी-फरवरी में जब दोबारा प्रेग्नेंट हुयी तो उसकी हिम्मत ज़वाब दे गयी.उसने अपना सारा दर्द माँ-बाप से बयां कर दिया. शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि पति ने अबार्शन के लिए दवा की हार्ड डोज़ दे दी जिसके कारण उसकी दूसरी किडनी भी ख़राब हो गयी.जिस पति ने सात जनम तक साथ जीने मरने  की कसमें खायीं थी उसने भी अंशुमाला का साथ छोड़ दिया. अब वह अपने माता-पिता के घर पटना में है.शास्त्रीनगर के  सरकारी आवास में वह अपनी माँ और  दो साल के बेटे के साथ अपनी ज़िन्दगी के बचे-खुचे दिन गुज़ार रही है.उसके पिता जहानाबाद जिले में तैनात हैं और बिहार सरकार से बेटी की देखभाल के लिए पटना तबादले की दरख्वास्त की है.पता नहीं बिहार सरकार कब सुनेगी? एक सिपाही की आर्थिक हालत का अंदाज़ा कोई भी आसानी से लगा सकता है.इलाज के लिए वो वेल्लूर से लेकर दिल्ली तक मदद की गुहार लगा चुके हैं लेकिन कहीं से कोई उम्मीद की किरण नहीं दिखी और उधर अंशुमाला के पास गिनती के दिन ही बचे हैं.
                                                                                 अंशु का मैथिली में गंगा कैसेट्स की ओर से 'प्रिय पाहुन' नाम से कैसेट भी निकल चुका है. एन.सी.सी. की 23वीं  बटालियन में भी रह चुकी है. 2009 -11 में मानव  संसाधन मंत्रालय से स्कॉलरशिप प्राप्त कर चुकी अंशु के अरमानों का क्या होगा? दिल्ली जैसे शहर में पढ़ने के बाद हर किसी का सपना कमाने और अपने सपनों को पूरा करने का  होता है लेकिन अपने शहर लौटने पर क्या हर लड़की का हश्र अंशुमाला जैसा ही होगा? जहाँ एक ओर बिहार की ही रतन राजपूत ने स्वयंवर में अपना वर चुना है, दिल्ली में ही स्लट वॉक के लिए महिलाओं ने कमर कस ली है तो दूसरी ओर अंशुमाला की सांसों की डोर टूटने को है और उसी के साथ वो सपने भी बिखर जायेंगे जो अंशु की आँखों ने देखे थे.ये सिर्फ अंशुमाला के सपने नहीं है ये हर उस लड़की के सपने हैं जो अपने भविष्य को स्वयं के हाथों से गढ़ना चाहती है. क्या हम अंशु के लिए कुछ भी नहीं कर सकते? बेशर्मी के सहारे ही सही अगर अंशु की सुध लेने को तैयार है तो हमें इसमें झिझकना नहीं चाहिए? क्योंकि ज़िन्दगी ख़तम होते देखना इतना दुखदायी नहीं होता जितना की सपनों को आँखों के सामने बिखरते देखना.             
        

बुधवार, 29 जून 2011

                                                           पैसा बोलता है..............        
आज से कुछ साल पहले तक घर के सभी फैसलों में  बड़े -बूढों की सलाह अहम् होती थी पर वक़्त बदल चुका है. खाने के नमक से लेकर चार धाम कि यात्रा तक कि जिम्मेदारी इन विज्ञापनों पर ही है.अभी हाल ही में झंडू बाम के  एक विज्ञापन में मुन्नी अपनी पतली कमर लचकाते हुए इसके साथ चार धाम की यात्रा की बात करती है. पप्पू इस बार पास होगा कि नहीं इस बात से लेकर हमारे समाज कि सबसे  बड़ी हकीक़त कि पैसा बोलता है;अनजाने में ही सही एक कड़वा सच बड़ी सफाई से कहा है. दरअसल विज्ञापन असली और नकली नोटों में फर्क बताता है. शुरुआत कुछ इस तरह से है..........नज़र जो  तेज़ रखते  है वो सबकुछ ताड़ लेते है,पैसे की भाषा सुनिए क्योंकि पैसा  बोलता है. है न कितनी मारू बात? पहली लाइन जैसे सुनी गांठ  बांध ली मैंने. इन स्कूली गुरुओं ने तमाम गुरुमंत्र दिए अब तक पढाई के, सफलता के,और न जाने  कौन-कौन से दुनिया भर के आधे  से ज्यादा तो याद भी नहीं.  
                                                                                                     बात तो पूरे बत्तीस आने सच है.अब देखिये  न नेता लोग कैसे  ताड़ लेते  हैं कि किस डील में कितने वारे-न्यारे किये जा सकते हैं.बोफोर्स हो या २जी हो; आखिर ताड़ा तो ज़बरदस्त तरीके  से होगा तभी तो इतना बड़ा गेम खेला होगा.रही बात पैसे की भाषा समझने की तो ये कोई पुलिस वालों से सीखे, सरकारी दफ्तरों में बैठे बाबुओं से पूछे कि किस रंग कि पत्ती दिखाने पर कितना काम होता है. विज्ञापन आगे बोलता है .............ये मेरी नब्ज़ है देखो,इसे परखने की आदत बनालो. बस यहीं थोड़ा चूक गए. ये भी भला कोई बताने की बात  है क्या. अरे ये तो हमारी खून में घुल चुका है.  चाहे  तो रक्त परीक्षण के लिए भेज कर देख लो. श्वेत और लाल रुधिर कनिका और भी कई चीज़ें पकड़ में आ जायेंगी लेकिन पैसा की लत न पकड़ में आयेगी.हमारी अदालतें तो पुण्य भूमि है इसकी जहाँ गवाह इसी नब्ज से तय होते हैं.कितनी ज़बरदस्त बात कहता है ये आगे...............न पहिये  हैं न पंख है पैसा चलता चलता रहता है. सच्ची! .चलना तो कोई पैसे से ही सीखे. ये और मैं तो कहती हूँ की बच्चों को भी चलना इसी से सीखना चाहिए बड़े -बड़े मंत्रालयों, देशों से होते हुए ये कुछ ही समय  में स्विट्जरलैंड पहुँच जायेंगे.और आखिर में पूरे विज्ञापन का रस यह है कि...........मेरी रंगत तो देखो.क्योंकि पैसा बोलता है. इसे कहते है बिलकुल बमफोड़ू बात. बस रंगत जन लिए  तो  जानो पूरा गीता का ज्ञान पा लिए. अरे वही रंगत जिसका बोलबाला है.जिसकी रंगत और संगत दोनों ही वर्तमान  में सबसे प्रचलित हैं. जो सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले इष्ट हैं. वही घनश्याम. मतलब ये कि काले रंग का बोल-बाला है.पैसा तो बस धनस्याम ही हैं बाकि तो कागज की रद्दी है. इसलिए मित्रों पैसे कि भाषा सुनिए....................        




   

सोमवार, 27 जून 2011

                                         आधी रोटी पूरा  चाँद

जिस एहसास से हु मैं कोसों दूर,
मुझको ये न भाता है,
बिन आहट के खिड़की से,
 दबे पांव आ जाता है,
धरती  हूँ; बारिश .की बूंदे तुम,
सोंधी महक ये प्रेम  हमारा,
मिल जायेंगे दोनों जब,
महकेगा सारा संसार,
साथ में है अपने बस आधी रोटी पूरा चाँद.

                                                                    ख्वाब ये कैसा पलकों में मेरी,
                                                                    जैसे हम हैं साथ-साथ,
                                                                    लेकर हाथों में हाथ,
                                                                    गुज़रे पूरी चांदनी रात,
                                                                    बस  देखते हुए एक दूजे को,
                                                                    कर लेंगे पूरी दिल की बात,
                                                                    आधी रोटी हो  बस पास हमारे,
                                                                    और गगन में पूरा   चाँद.

रिमझिम जब ये  बारिश हो,
दूर कहीं तुम मुझसे हो,
झाकूंगी मैं बाहर हौले से,
आना तुम बनके ठंडी फुहार,
क्या हुआ जो?
रोटी  नहीं है आज पास हमारे,
चल बाँट ले आधा-आधा चाँद.
                                                                   बादल का  तकिया बनाकर 
,                                                                  सो जायें क्यों  न नील गगन में, 
                                                                   इतना  निश्छल हो मिलन हमारा,
                                                                   कि देखे संसार ये सारा,
                                                                   बुनेंगे सपने मिलकर हम,
                                                                  कैसी दिखती है आसमान से?
                                                                  पूरी  रोटी,
                                                                  और पास से पूरा चाँद.

शब्दों में तुझको पिरो दूँगी,
और तस्वीर  में मुझको तुम,
करेंगे फिर अदला-बदली,
इतने में रात  गुजर  जाएगी,
ख्वाबों से तुमको जाना होगा,
आधी रोटी संग  मैं नीचे बैठी  हूँ,
 पूरे  चाँद के साथ ऊपर तुम.  

गुरुवार, 16 जून 2011

                                      प्रेम समस्या सप्रेम समाधान ..........................
प्रिय रोगियों इस  लेख को लिखने का आशय यही है कि इस सेक्युलर देश में रहते हुए भी आप कुछ विषयों पर खुल के नहीं बोल सकते.यहाँ आपको कुछ प्रश्नों के उत्तर बिना पूछे ही मिलेंगे जिनसे हर भारतीय आए दिन दो चार हो रहा है.

सवाल- मेरे स्वामी को धन-स्याम और भ्रष्टाचार विद्रोह से प्रेम हो गया है.ये इनके दिलो-दिमाग़ पर इस तरह से छा चुका है कि पिछले दिनों ये अनशन पर बैठ गए. घर परिवार और जमे जमाये धंधे से उनका मोह भंग हो चुका है.मैं बहुत परेशान हूँ.इस चक्कर में उनकी सामाजिक मान प्रतिष्ठा को गहरा अघात पहुंचा है. कृपया मार्गदर्शन करें.                                   -एक अंध अनुयायी, योगनगर 

जवाब-देखिये अंध अनुयायी जी, मैं आपकी समस्या को समझ रही हूँ क्योंकि कुछ समय पहले तक मैं भी इसकी शिकार थी. पहले तो आप उन पर नज़र रखिये कि उनका ये अटूट प्रेम किस वजह से है.और हाँ उन्हें ये समझाने कि भरपूर कोशिश कीजिये कि इस वजह से वो न घर के रहेंगे न घाट के.जिस कस्तूरी के पीछे वो भाग रहे हैं उसकी उन्हें आदत नहीं है.

सवाल- डाक्टर जी, मेरे मनभावन जी का  मन आजकल किसी चीज़ में नहीं लगता. बड़े आलसी हो गए हैं.उनके काहिलपने का आलम ये है कि अभी पिछले दिनों ही उनके ऑफिस में ही क्या चल रहा है उन्हें पता नहीं चला.मुझे लगता है कि मेरे सीधे साधे मनभावन जी पर किसी ने जादू टोना कर दिया है. जहाँ ज़रूरत होती है वहां पर भी न बोलना उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है.अब आप ही बताएं कि उनका क्या किया जाये? वैसे पिछला     रिकॉर्ड उनका काफी अच्छा रहा था.जिसके लिए उन्हें अगले पांच साल के लिए प्रमोशन भी मिला था. आपसे बड़ी उम्मीदें हैं.                                                                            -राजनीतिशरण सिरमौर, राजधानीनगर.

जवाब- आपका केस ज़रा गंभीर होने के साथ-साथ थोड़ा अलग भी है, लेकिन परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है.क्योंकि हमारे देश ने राजनीती के तिकड़म विज्ञान में पिछले दिनों बड़ी तेज़ी से तरक्की की है.आये दिन नए शोध हो रहे हैं.उन्हें ये समझाने का प्रयास कीजिये कि अपने काम से काम रखना अच्छी बात है लेकिन कम से कम अपने घर में क्या  चल रहा  है इसकी  खबर उन्हें होनी चाहिए. कम्पनी के लिए वफादार होना अच्छी  बात है लेकिन इमेज नाम की भी कोई चीज़ होती है.ऐसी समस्याएं स्थायी नहीं होतीं.बुरा न करने का मतलब ये कतई नहीं है कि गड़बड़ कहाँ हो रही है इसे भी न देखा जाये.

सवाल- मेरी समस्या औरों से थोड़ा अलग है.बात ये है कि मेरे बैंड बाजा को बंटवारे के दौरे पड़े थे.इस दौरान उन्हें डॉलर नाम की बीमारी हो  गयी. पहले तो हम समझ ही नहीं पाए लेकिन जब मीडिया नाम का एक चेकअप कराया तब इस चूसलेवा बीमारी का पता चला. इन दिनों वे कानून नाम के अस्पताल में भर्ती हैं.कृपया ये बताएं कि उनकी इस बीमारी को जड़ से कैसे ख़तम किया जाये?                    - शुभचिंतक, संचारगली 

ज़वाब-आपने जो समस्याएं बताई हैं उससे यही पता चल रहा है कि उन्हें डॉलर में कमाने की लत लग गयी है. बेहतर यही है कि उन्हें तिहाड़ नाम के सुधार गृह  में रहने दिया जाये. और जब कभी भी ऐसे दौरे दुबारा पड़े तो उन्हें बस डॉलर दिखा दिए जायें.लेकिन ध्यान रहे कि उचित दूरी बहुत ज़रूरी. अगर तब भी कोई लाभ न मिले तो सेना नाम के प्रतिष्ठित सुधार गृह में रेफर कर दिया जाये.अगर कश्मीर  वाली ब्रांच मिल जाये तो बेहतर.आप मुझे आपने केस कि साडी जानकारी रिपोर्ट सहित भेज दें.मैं इसे आपने विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहती हूँ .     

 सवाल- हम पुराने रईस हैं. खाता पीता परिवार है. हर तरीके का शऊर हमें सिखाया जाता गया है.हमारे बिक्की राजा ने कोई लोकतंत्र नाम का पेशा अपनाया हुआ है.पता नहीं आजकल वो लोक लाज सब छोड़कर बकबक करने लगे हैं.कोई उपाय सुझाएँ.                                                       -भड़भड़िया खंड 

ज़वाब-देखिये ये उम्र का असर हो सकता है.ये भी हो सकता है कि उन्हें यही डिपार्टमेंट दिया गया हो.तो चिंता छोड़ कर आप वक़्त का इंतजार करे.हजारे नाम कि पुरवाई जब टल जाएगी तो वो खुद बा खुद शांत पड़  जायेंगे.कह सकते हैं कि ये मौसमी बीमारी है.  


नक्कालों से सावधान! प्रेम समस्या सप्रेम समाधान का असली दवाखाना.इलाज पसंद आए  तो कृपया लिंक देख कर ही फोल्लो करें.बाकी अनकही परेशानियों से निजात पने के लिए आज ही फ़ॉलो करें.हमारा पता है-blogspot wali dukan- www.bolobindassssss.blogspot .com