सोमवार, 12 अगस्त 2013

मैंने आसमान को ज़मीन कहा..... और जमीन को हौसला मेरा......ऊपर बढ़ना मेरी फ़ितरत न थी...जितना ऊपर बढ़ा .......उसके दोगुना जमीन में ......किसी की ज़िद है मुझे कतरते रहने की...और मेरी सनक जमीन में ऊंचा उठते रहना 

(शायद नयी उमर का जोश था ) 



-संध्या
कोई नयी बात तो नहीं थी...बस आधे -पूरे का खेल था...ज्यादा कुछ नहीं....आधा चाँद ...पूरा सूरज.....आधी प्यास का समंदर....पूरी तृप्त नदी .....मकान बनाने का सामान ......मौरंग से बीने गए कुछ पत्थर और शंख.....शंख ही थे बिना आवाज़ वाले...पूरी पाजेब और आधी टूटी चूड़ियाँ....आधी जली सिगरेट के टुकड़े और पूरी रातें...पता नहीं मुझे आधे से लगाव था या तुम्हारे पूरेपन से प्यार..... तुम्हारे पूरे होने की चाहत में.....अधूरी होती मैं..


(तुम गर्व करो अपने पूरा होने में ......और मैं अपने अधूरेपन पर)


-संध्या

भूत के पांव सी 

एकदम खड़ी दोपहरी 

सूरज पीठ पर उठाये 

एक रिक्शे वाला
 
मैं पसीने से तरबतर

सलीके से पोछती हूँ 

चेहरा अपना 

बस अगले मोड़ तक कहकर 

धप्प से बैठ जाती हूँ

गर्दन से ऊंची इमारतें 

पुच्छल तारे सी चमक वाले 

दुनिया बदलने का दावा करते 

चमकीले विज्ञापन

लाल बत्ती की गाड़ी 

बनी ठनी एक औरत 

हाथ में पिघलती वनीला आइसक्रीम 

और भीख मांगता बच्चा

सन क्रीम की परत चढ़ाए एक लड़की 

घर पहुँचने की जल्दी
 
मैं टोकती हूँ 

रिक्शा थोडा तेज चलाओ 

इतने में बदन झुलसाती 

तेज़ लू का झोंका 

और हवा में उड़ती 

उसकी बिना हाथ की खाली आस्तीन 

रिक्शे वाले 'प्रमोद'

सचमुच रिक्शा पाँव से नहीं चलता 

...न तो हाथों से 

पेट तय करता है रफ़्तार इसकी 

अखबार के तीसरे पन्ने पर

बेबसी की कीमत डेढ़ सौ रुपये

मैंने कुंठा में खबर का गला घोंटा

और कविता लिख दी


(गरीबी की ठीक ठाक कहीं कीमत लगे तो बताना .....मैं बेंचूगी कविता )

-संध्या

हिचकियाँ


हिचकियाँ

पता नहीं तुम याद कर रहे थे

या जब कर रहे थे भूलने की कोशिश

तब आई थी मुझे हिचकियाँ

कहावतें कहती हैं कि चुराकर खायी गयी

चीज़ से भी आती हैं हिचकियाँ

मैं स्वीकार करता हूँ 

उन सब बातों का चुराना.... 

जो तुमसे चाहकर भी

कह नहीं सका कभी

घुट गयी थी मेरी सब हिचकियाँ

जबकि हिचकियों का विज्ञान

कुछ और ही कहता है

मेरी सांस में अटक गया था

जब तुम्हारी याद का एक निवाला

हिचकी तब भी आई थी

तुमने ध्यान नहीं दिया होगा

तुम्हारी आदत भी कहाँ है

सब कुछ ध्यान रखने की

गले लगना और गीला कंधा

तब बंध गयी थीं गला भर भरकर 

हिचकियाँ..............

जिस दिन मैंने तुम्हारा एकलौता ख़त 

नदी में में बहा दिया था 

पत्थर बांधकर

शायद वो मेरी आख़िरी हिचकी थी 

(मैं मर तो उसी दिन गया था......हिचकियाँ मेरे जिंदा होने का सुबूत थीं)

-संध्या

प्रेम में दूसरा क़दम 

नहीं उठाया गया मुझसे 

पहला ही भरपूर कहाँ

जी पाया कोई एक जनम में 

....................संध्या

  1. मत भूलो तमाम उड़ानें हैं आसमान के उस पार 
  तुम ले जा सकते हो अपना डिब्बाबंद प्रेम



2

हमने उसे सफेद संगमरमर कहा
बच्चे कैसे समझते ताजमहल का मर्म भला
जातक कथाओं में शहंशाह कहां?


3



और अंतिम उपहारस्वरूप उसने भिजवाई
एक जोड़ा कठपुतलियां,आम प्रेम कहानी में
पढ़ा दो मौतों का मर्सिया

4

तुम्हारे नाम की एक उबासी 
पुराने संदूक में रखकर भूला और इसतरह
प्रेम में नया औज़ार जुड़ा
-संध्या
· 



5
तुम मनाओ अपनी अपनी ईद

मेरे घर से चाँद का जनाज़ा निकला

सिर से छत भी गयी


6



ज्यादा नहीं मांगती 

बस लौटा देना 

विदा से पहले के 

कुछ क्षण मुझे 

( जो तुम लौटा न सके )


7


अक्सर कविताओं में मैं


'ती' को 'ता' कर देती हूँ

जानती हूँ कि कुछ 

कलम वाले लोग कह उठेंगे 

स्त्री है बस लिख सकती है 

'बिस्तर के अनुभव अच्छे'

जीने मरने की कसमें

इस कड़ी में सबसे पहले संवाद मरा

फिर वो सब बातें

घर पहुँचने का लम्बा वाला रास्ता

चूड़ी के बदले लिया गया कड़ा मरा

दुपट्टे के छोर से उलझ गया वक़्त और

टांकने के बहाने लिया था जो

कुरते का बटन भी मर गया

दीवार परकैलेण्डर की पीठ का निशान

पुरानी तारीख़ पर लगा नया गोला

मनौती के पेड़ पर खुरचा

बिना हाशिये का नाम

चोरी से रखे गए सलामती के

व्रत-उपवास मरे

फिर एक दिन तुमने कहला भेजा

भिजवा दो मेरा वो एकलौता ख़त

जिसमें लिखा था छुपाकर

मेरे नाम का सिर्फ़ पहला अक्षर

अनचीन्हा सा डर रहा होगा

तभी तो तुमने बढ़ा दी थी

मेरे नाम के पीछे ई की स्त्रीसूचक मात्रा

इस तरह मेरा नाम भी

मरता रहा शनैः शनैः

मान्य सूरज जब ढूँढा गया

जब तुम्हारे निष्कलंक माथे का

इस कड़ी का अंतिम गवाह

चाँद भी मर गया
.............................................

(मरना इतना आसान कब था.....लो मैनें जातक कथाओं में ज़िंदा रखी है मरी हुई हर चीज़.......जिसे बच्चे सीखेंगे संस्कार की तरह)

---------------------संध्या