गुरुवार, 14 जून 2012

पिटरोलवा बड़ा सतावेला

                                               
लगभग दो हफ्ते से देश की जनता पेट्रोलमय है। जैसे कॉँग्रेस राहुलमय और भाजपा मोदीमय रहा करती है। बॉलीवुड की सारी हीरोइनों को छोडक़र पेट्रोल सबसे हॉट बना हुआ है, सबसे सेक्सी जिसे देखकर ही कुछ नहीं बल्कि बहुत कुछ करने का मन करता है। जनता बेचारी अब तक बम धमाकों, रेल दुर्घटनाओं और भगदड़ों से मरा करती थी पर अब पेट्रोल के दामों से मरती है। अगर अलादीन का चिराग मिल जावे तो उससे टैंकर दो टैंकर पेट्रोल मांग लेवें। पिटरोल से जउन हाय तौबा मची है थोड़े दिनों में उससे कुछ ऐसे सीन बनेंगे-
                                                                 हॉस्पिटल मरीजों से भरा पड़ा है। जहाँ हर किसी को सर्दी खांसी के बजाय पेट्रोमेनिया हुआ है। रोग विशेषज्ञ के रूप में पेट्रोल मंत्री खासतौर से दिल्ली से चल चुके हैं। दवाइयों की जगह पेट्रोल की दो-दो बूँदें और क्रिटिकल केसेज में पेट्रोल के इंजेक्शन सधे मरीज की नसों में ठोंके जा रहे हैं। घरो में डकैतियां अचानक से बढ़ गयी हैं। डाकू लल्लन घोड़े पर मोटरसायकिल लादकर आया है और सोने-चांदी की जगह पेट्रोल लूटकर ले जा रहा है। इधर मंजनुओं की तो समझो वाट लग गयी है। लैला गिफ्ट  में पेट्रोल के जरी केन, यार्डले की परफ्यूम की जगह बोतल भर पेट्रोल और डेट के लिए किसी पेट्रोल संग्रहालय चलने की जिद पर अड़ी हुई है। तेल कंपनियों के साथ सरकार पेट्रोल की चुस्कियां ले रही है। बच्चे खिलौने के बजाय पेट्रोल से चलने वाली गाडिय़ाँ मांग रहे हैं। घरों में गंगाजल की जगह अब पेट्रोल ने ले ली है। मानसरोवर और कैलाश की यात्रा पर जाने वाले श्रद्घालुओं ने बड़ी सफाई से भगवन को ठेंगा दिखाकर खाड़ी देशों की तीरथ यात्रा पर चल पड़े हैं। कहावतें भी बदल गयी हैं। लोग चूल्लुभर पानी की जगह चुल्लूभर पेट्रोल में डूब मरने को उतावले हैं। अमेरिका ईरान को उतने ही पैर पसारने की धमकी दे रहा जितना उसके पास है पेट्रोल। बच्चे स्कूल में पी फार पैरट के स्थान पर पेट्रोल पढ़ रहे हैं। जब बच्चे झगड़ते हैं तो आपस में कुछ ऐसे दम दिखाते हैं-अले बे मेले को जानता नहीं। मेले पापा नेता हैं। दूसरा- तो मे कौन सा कम हूँ तेले से, मेले पापा पुलिस में हैं झूठे केस में अंदल करवा देंगे। तीसरा-बस कलो तुम दोनों जो मेले पापा के पास है वो तुम दोनों के पापा के पास नहीं है। मेले पापा के पास पेट्रोल पम्प है। सोसाइटी की मॉडर्न लेडीज की किट्टी पार्टियों के नज़ारे भी बदल गए हैं। एक दूसरे की गाडिय़ों और गहनों की जगह पेट्रोल पर पंचौरा हो रहा है। मिसेज खन्ना मिसेज भाटिया से कुछ यूं सवाल करती हैं-सुना है आपके दो- दो पेट्रोल पम्प हैं। हमारे इनको जऱा डिस्काउंट दिलवा दीजिये अपने उनसे कहकर और तो और केबीसी के विजेता को पांच करोड़ की जगह पांच लीटर पेट्रोल दिया गया है। भ्रष्टाचार और काले धन पर अप्रत्याशित रूप से रोक लग जाने के कारण अन्ना और बाबा रामदेव की दुकानदारी पर बट्टा लग गया है। लोग-बाग़ भी घूस देने के लिए रुपये की जगह पेट्रोल प्रिफऱ कर रहे हैं। बैंकों ने नयी स्कीम चला दी है। अब रूपये और गहनों के साथ पेट्रोल भी बैंक में जमा किया जा सकेगा। पर्यावरणविद भौंचक्के हैं। लोगों ने अपने पेट्रोलचालित वाहनों में सायकिल के पैडल लगवा लिए हैं। हीरो होंडा हो या हार्ले डेविडसन, मर्सिडीज हो या फेरारी सब पैडल मार-मारकर चलायी जा रही हैं। जऱा कल्पना कीजिये राजपथ पे सारी गाडिय़ाँ सायकिल के पैडल से चल रही हो तो समानता का कैसा मनोहारी दृश्य उत्पन्न होगा। उधर बॉलीवुड में भी पेट्रोल चल निकला है। फिल्म इशकजादे के बाद पेट्रोलजादे, पेट्रोलघाट और पेट्रोल के लुटेरे बन रही हैं। भोजपुरी फिल्मों के नाम कुछ ऐसे रखे जा रहे हैं- पेट्रोलवा बाबू आई लब यू, पिटरोलवा पे मनवा डोले,पिटरोलवा बड़ा सतावेला, दिल ले गईल पिटरोल पम्प वाली और निरहुवा के पिटरोल रोग भईल ते गज़ब की कमाई करे रहिल।  मां बेटे की बलइयां लेते हुए कहती है मेरे पिटरोल जैसे बेटे की नजऱ लगे और बेटा हो तो पिटरोल जैसा।
                                                 पेट्रोल महिमा देखकर हम भी सोच रहे कि अपनी वसीयत लगे हाथ बनवा लें।  यदि मंहगाई की वजह से मेरा ऊपर का टिकट कटता है तो अंतिम संस्कार में मिलावटी घी और लकडिय़ों की जगह पेट्रोल डालकर फूंका जाये। माना कि हम जैसे पापी रोज़-रोज़ जनम नहीं लेते पर फिर भी खून के आंसू रोने के बजाय पेट्रोल के आंसू रोना। जब प्राणपखेरू होने को हों तो विषैले गंगाजल की जगह कुछ बूंदे पेट्रोल की मुंह में डाल दी जायें हम तर जायेंगे।     
                                   

गुरुवार, 7 जून 2012

चलो कुछ क्रिएटिव करें



लो जी संसद में कॉपी राईट एक्ट पास हो गया और फायदा जिसका ये हुआ कि आप किसी  के पहले वाले काम की चोरी नहीं कर पाएंगे.जैसे दो पडोसी आपस में कटाजुझौव्वर कर रहे हैं.एक दावा करे कि पूरे मोहल्ले में बीवी से पीटने वाला वो पहला है इतने में दूसरा झट से चिल्लाये नहीं रे तुझसे पहले मैं था.. ये क्रिए..टिबिटी का सवाल है इसलिए सब पर समान रूप से लागुएमान है. अब से जो कुछ भी नया और पहली बार होगा क्रिए..टिबिटी यानि की रचनात्मक माना जायेगा. क्रिए..टिबिटी का कानून बनने इस अदने से मन मस्तिष्क में कुछ दृश्य बन रहे हैं.

दृश्य एक-सभी राजनीतिक पार्टियाँ अपने पे उतर आयीं हैं. अभी तक सेना टाईप की पार्टियाँ ही खुल्ले में हंगामा करती थीं पर अब भाजपा के साथ साथ कांग्रेस ने भी कब्ब से डुबकी लगा दी है. भाजपा त्रिशूल और सेना सहित चिल्लपों मचा रही है कि घोटालों का सारा क्रेडिट कॉँग्रेस ही ले जाये ऐसा कैसे हो सकता है. अगर दस्तावेज़ बाकी बचे होंगे तो जाँच से ये साफ़ पता चल जायेगा कि घोटालों की शुरुआत हमीं से मानी जाये. इस दलाली भरी दलील पर पर कॉँग्रेस चीयरलीडर्स सी कुलांचे भरती है और अपने निकनेम का हवाला देते हुए कहती है कि इस मामले में जो भी कहेंगे सच कहेंगे.आखिर इतने बड़े बड़े घपलों का खुलासा हमारी सरकार में हुआ तो क्रेडिट हमहीं को जावे. इतनी चू-चपड़ के बाद मेरे द्वारा स्वविवेक से यह मान लिया गया है कि जिस प्रकार से सूर, तुलसी के जन्मस्थान  को  एक किवदंती के अनुसार निर्धारित किया जाता रहा है. ठीक उसी प्रकार सबसे 'पहले और सबसे बड़े घोटाले का जन्म खान और किस सरकार में हुआ इसका पता नहीं लगाया जा सकता है.

दृश्य -परधानी के बाद अब निकाय चुनावों में एक नयी परकार की रचनात्मक पुरवईया चल रही है. क्रिए..टिबिटी का भण्डार चुनावी पोस्टरों में साफ़ देखा जा सकता है. जहाँ महिला प्रत्याशी हाथ जोड़े फोटू ऐंचवा रही है जो घर में भी हाथ जोड़े रहती हैं और फोटू में भी. साथ में महिला का पति भी लगता है पहली दफ़ा शादी के सात फेरों का पालन तटस्थ भाव से करता दिख रहा है और सेम सेवाभाव से हाथ जोड़े खड़ा है. इसके अलावा वोट मांगने के लिए जिन दयनीय शब्दों का प्रयोग किया जाता है उसके आगे तो अव्वल दर्जे के भिखारी भी शरमा जायें. इसे निम्नलिखित डेमो के द्वारा समझा जा सकता है-

प्रिय जनता आपके चरणों में आजीवन सेवारत क्षेत्र के इमानदार प्रत्याशी को भरी मतों से विजयी बनाएं.

दृश्य - प्रीतम और अनु मालिक जैसे कुछ धुन और स्टोरी चोट्टों को छोड़ तो बॉलीवुड रचनात्मकता का सबसे बड़ा खरीददार और बेंचूलाल है. जितना सम्मान वो मधुबाला और मीना कुमारी को देता है उसी भाव से वीना और पाउली डैम को भी देता है. इस तरह की विशेष श्रेणी की रचनात्मकता को नेता लोग संसद में देखकर सम्मान देते हैं.यानि बात संसद में कॉपीराईट एक्ट के पास होने से शुरू हुयी थी और अंत में संसद में रचनात्मकता के सम्मान पर आकर रुकी.पाठकों से निवेदन है कि वे मेरी ज़बरदस्ती का लेखक बनने की हुज्जत को इस लेख को पढक़र सम्मान दें.भई!आखिर रचनात्मकता तो आखिर रचनात्मकता होती है .

पहले बोरियां बनाइये फिर अनाज उगाइये


देश तमंचे खरीदने में लगा है. ए. के .सैतालिस बोर का तो कभी इत्ते बोर का को कभी उत्ते बोर का. रक्षामंत्री और प्रधान मंत्री के साथ साथ कृषि मंत्री जी को सनद रहे कि इस देश में बोर टाईप की ही एक और चीज़ की बड़ी सख्त ज़रूरत है और वो है बोरियों की. ऐसा नहीं है की देश में बोरिया उत्पादन की टेक्नोलॉजी नहीं है.घोटाले के रूपये भरने के लिए बोरियां हैं,मर्डर करके लाशे फेंकने के लिए हैं, पत्थर की मूर्तियों को ढंकने के लिए हैं, पडोसी देशों को निर्यात करने को हैं और जहाँ जहाँ बोरियों की अखिल भारतीय आवश्यकता है वहां बोरियों की कमी नहींपर अनाज भरने को बोरियों की कमती है इस देश में. किसान ने अपना कम कर दिया बिना फल की इच्छा किये. पर सरकारें जो हैं न ये तो सांस भी बिना मतलब के नहीं लेती हैं तो बोरियां कहाँ से देने लगी. सुनने .में तो ये भी आया है कि गेंहूं कि इस साल बंपर कचैंधर मची है जिसके कारण सरकार ने उसे निर्यात करने का निर्णय लिया है. मतलब अनाज रखने का जुगाड़ नहीं करेंगे पर बेंच देंगे.बंपर उत्पादन तो घोटालों,नेताओं और झूठे चुनावी वादों का भी होता है वो सब भी थोक में भेज दें. फिर भी न समझ आये तो चाईना से सस्ती टेकनीक वाले सस्ते बोरे ले लो. वो तो कबसे तैयार बैठा है लंगोट से लेकर बोरे तक से दुनिया भर कजे बाज़ार पाट देगा.रूस से बोरा टेकनीक लेने में थोडा पेंच फंस सकता है वो संयुक्त तकनीक से बोरिया उत्पादन करेगा और हमारे बोरिया वैज्ञानिकों के हाथ बस उसकी सिलाई लगेगी. या फिर बोरिया लीज पर देगा. ये मान के चलो कि सीधे सीधे कुछ नहीं देगा. अनाज पड़े  पड़े सड़ जाए, चूहे खा लें, किसानों को उसके दाम न मिले पर गरीबों में नहीं बाँट सकता है. बंटेगा तो गरीब कितने हैं ये भी पता चल जायेगा न.  तो कुल मिलकर सार यह है कि देश आतंकवाद, नक्सल,अशिक्षा,नेतागिरी और पडोसी देशों के साथ साथ बोरिया समस्या से भी जूझ रहा है.और ये समस्या राष्ट्रीय समस्या है क्यूंकि बीते दिन नहीं भूलने चाहिए जब हम अमरीका के सामने लबराते हुए ताका करते थे. हालत अब भी काफी हद तक वही है तब अनाज के लिए अटकते थे और अब हथियार और पकिस्तान कि कान खिंचाई के लीये.अगर बोरियों कि समस्या से ऐसे ही देश जूझता रहा तो एक विदेश नीति बनानी पड़ेगी बोरिया खरीदने की. जैसे अनाज की उत्पादन बढ़ने के लीये हरित क्रांति, दूध उत्पादन के लीये श्वेत क्रांति को पंचवर्षीय योजना के तहत चलाया गया अब  योजना बोरिया क्रांति का समय आ चुका है.पहले बोरिया उत्पादन  करो फिर अनाज उत्पादन.

चिगी मिगी मिग

मिग ले लो मिग, मिग ले लो मिग. पुराना टूटा फूटा अन्दर से खोखला, संयुक्त प्रयास से बना मिग. मिग २१ लो या २९ सबका एक ही काम, एक ही खूबी. रूस आवाज़ लगा लगाकर बेंच रहा है और भारत उसे पाने के लिए मचलता रहता है कि रसिया मैं तो मिग वाला खिलौना लेहौं. भले ही एयरपोर्ट पर सजावट के लिए खड़ा कर दूं, पडोसी को डराऊं कि मेरे पास मिग ही तेरे पास क्या है । । हैं।  खूबी तो सुनो ऐसा वैसा मिग नहीं है। । । पहली बात तो आसानी से उड़ता नहीं और जब स्टार्ट हो जाता है तो बीच आसमान में धोखा देता है।  बेचारा पायलट चेन पुलिंग भी नहीं कर सकता। जान तो जाती ही है उस पर से इलज़ाम भी उसी पर। होना तो ऐसा चाहिए कि मिग पर लर्निंग लिखवा लें जिससे दुर्घटना होने पर कोई लोचा न होने पाए।  खिडक़ी खोल कर भागा भी नहीं जाता।  ये तरकश का वो दिखाऊ तीर है जिसे रखने में बड़ा खर्च आता है।  हमारे जो सैनिक अकेले दम पर दस दस आदमियों पर भारी पड़ते हैं वो इस मिगनुमा खिलौने से हार जाते हैं।  एक बात तो तय है कि जाको राखे मिग मियां मार सके न कोय।  रूस बेचारा क्या करे उसके यहाँ जगह कम पड़ जाती है इसीलिए इण्डिया से कह देता है कि बहन रख लो बाद में दे देना तुम पर हमें पूरा भरोसा है।  पैसे न हो तो  पायलटों की जान के बदले ले लो।  पायलट की जान तो तुम्हारे यहाँ वैसे भी सस्ती है।  उन्हें दे देना कोई पदक वदक या पेट्रोल पम्प।  बड़े साहसी होते है तुम्हारे पायलट जिनको उड़ाने का खतरा हम नहीं उठाते उन्हें तुम पैसे देकर उठती हो।  बदले में ऐलान कर देंगे कि संयुक्त तकनीक से बनाया है।  भले ही तुम खाली नट बोल्ट कसना पर बनेगा तो संयुक्त तकनीक से न।  संयुक्त तकनीक भी बड़े काम की चीज होती है। हमारे यहाँ ये खूब चलन में है। जब विमान संयुक्त रूप से बनते हैं तो बहुत कुछ संयुक्त रूप से होता है जैसे पैसे का लेन देन। खरीद के कागज़ भी संयुक्त रूप से बांट दिए जाते हैं जिससे कि किसी एक को जवाब न देना पड़े।  जाँच हो तो संयुक्त रूप से कागज़ चोरी हो जायें।  अब तो समझ में आ गया हो कि मिग कोई ऐसा वैसा खिलौना नहीं है।  संयुक्त तकनीक वाला खिलौना है।  तो मिग ले लो मिग, संयुक्त तकनीक वाला मिग।    

तरक्की आखिर किस कीमत पर

                   

         पिछले कुछ दशकों में इंसान ने बहुत तेज़ी से तरक्की की है। ये तरक्की उसके रहन-सहन से लेकर जीवन के हर क्षेत्र में परिलक्षित होती है। विज्ञान और तकनीक के दम पर मानव ने जीवन को आसान और बेहतर बनाया है। समाचार पत्रों में हर दिन ऐसी खबरें छपती हैं जो नयी तकनीक व अविष्कारों से सम्बंधित होती हैं और जीवन अधिक बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इन सबका एक अन्य पहलू यह भी है कि ऐसा कोई दिन खाली नहीं जाता जब हमें ये सुनने को न मिले कि आज फलां जगह किसी ने आत्महत्या कर ली, तो कोई रिश्तों कि परवाह किये बिना पैसों के लिए अपनों को ही मौत के घाट उतार देता है। पिछले कुछ दिनों में ऐसी ही खबरें सुनने को मिलीं जो समाचार पत्रों के लिए एक या दो कॉलम की सामान्य खबर की तरह ही रहीं पर यदि इन घटनाओं की तह में जाने की कोशिश करें तो पाएंगे कि हमारे सामाजिक मूल्यों और ढांचे में ऐसा बदलाव आ रहा है जो हमें कुंठा और हताशा के गहरे गर्त में धकेल रहा है। लखनऊ के गाजीपुर में 19 मई को 62 की उम्र में  निर्मल मुखर्जी ने फांसी लगा ली,कारण घर बनवाने के लिए बैंक से लिया गया कज़ऱ् नहीं चुका सके। इसी तरह एक युवक ने महज़ इस वजह से मौत को गले लगा लिया क्योंकि काम पर न जाने को लेकर उसकी मां ने डाँटा था। कानपुर में एक 25 वर्षीय युवक ने बेरोजगारी से तंग आकर खुद को गोली मार ली और आगरा में 6 माह की बच्ची के साथ हुई दुराचार की घटना ने तो इंसानी हैवानियत की सारी हदों को पार कर दिया। ये सभी घटनाएं समाज में अपनी जड़ें जमाती कुंठा का नतीजा हैं। मनुष्य अपनी सारी समस्याओं और दुश्वारियों का हल एकमात्र आत्महत्या में तलाशने लग गया है। प्रेम-संबंधों में असफलता हो या बेरोजगारी या फिर घरेलू-कलह इन सबका हल आत्महत्या द्वारा चाहते हैं। आज जब हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं, 2020 तक भारत विकसित राष्ट्र बनने का सपना संजोये हैं और रक्षा उपकरणों के विश्व में सबसे बड़े खरीदार होने के साथ-साथ एक के बाद एक मिसाइलों का परीक्षण कर दुनिया को अचंभित कर रहे हैं। जिस देश को विश्व गुरु माना जाता है और पश्चिमी देश भी उसके आध्यात्मिक ज्ञान का लोहा मानते हों, वहां के समाज में इस तरह का अवसाद पनप रहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर किस तरक्की की ओर हम भाग रहे हैं? ऐसी उन्नति के क्या वाकई कोई मायने हैं जो मानसिक शांति न दे सके। यक़ीनन ओवन में  हमें खाना गर्म रखने की सुविधा विज्ञान ने दी लेकिन रात को चौके में बिठाकर मां के हाथों से रोटी खाने का सुख हमें दुनिया की कोई भी तकनीक नहीं दे सकती।रोबोट हमारे रोजमर्रा के सभी काम निपटा देगा पर रिश्तों की गर्माहट और सुरक्षा का भाव नहीं दे सकेगा। एक क्लिक पर हम दुनियाभर की खबर रखते हैं। एन्जिलिना जोली क्या खाती और क्या पहनती हैं ये तो हमें पता रहता है पर पड़ोस में कब कोई मर जाता है इसकी जानकारी हमें नहीं होती। फेसबुक पर हम वर्चुअल समाज के चौबीसों घंटे सक्रिय सदस्य हैं। शायद बेहद निजी पलों को छोडक़र हर पल की खबर स्टेटस अपडेट का हिस्सा है। वास्तविक समाज से कब कट गए इसकी भनक तक नहीं लगी। विज्ञान ने जहाँ जीवन को बेहतर बनाया है वहीं इसके दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। भ्रूणहत्या, विनाशकारी हथियारों और नए-नए आधुनिक उपकरणों की चाहत में बढ़ता लालच अपराधों को बढ़ावा मिलता है। हमने विकास के पैमानों को पश्चिम की तजऱ् पर निर्धारित कर लिया है। इसे निर्धारित करने वाले पढ़े-लिखे लोग ये नहीं जानते कि ऑस्ट्रेलियाई किसान और भारतीय किसान को एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। जरुरी नहीं कि जो तकनीक वहां सफल हो यहाँ भी हो जाये। मानव सभ्यता के काले इतिहास में दर्ज हो चुके नागासाकी-हिरोशिमा की त्रासदी को कोई नहीं झुठला सकता और इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इंसान तरक्की की चाहत में किसी भी हद तक जा सकता है। ये सही है की वक़त के साथ बदलाव बेहद जरुरी हो जाते हैं लेकिन किसी भी तरह के बदलाव के लिए तैयार होने से पहले इस बात पर ज़रूर गौर किया जाये कि आखिर ये बदलाव हम किस कीमत पार चाहते हैं? क्या अन्नदाता तमाम एकड़ उपजाऊ जमीन की कीमत पर या उनकी आत्महत्या के बदले, केजीएमयू में पढऩे वाले उस होनहार छात्र की जान के बदले जो अंग्रेजी न आने पर हीनभावना का शिकार था, या उन तमाम दोषियों को बेगुनाह छोडक़र जिनकी मानसिक कुंठा की शिकार मासूम बच्चियां तक बनती हैं? ऐसे तमाम सवाल हैं जिनके जवाब तरक्की की अंधाधुंध दौड़ में बहुत पीछे छूट गए हैं और हमारे तथाकथित सभ्य समाज को मुंह चिढ़ाते हैं।
                                                                 इन समस्यायों की वजह तलाशें तो कहा जाता है कि परिवार व्यक्ति की प्रथम पाठशाला होता है और  मां उसकी पहली शिक्षक। अफ़सोस की बात है कि इस पाठशाला पर टीवी संस्कृति हावी हो चुकी है। इस बुद्धू बक्से ने ड्राइंग रूम से ज्यादा हमारे संस्कारों में घुसपैठ की है,जिसके पारिवारिक सीरियल्स की कहानी प्रतिशोध, सास बहू के पारिवारिक झगड़ों और विवाहेतर संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसी कहानियों संस्कारों की उम्मीद करना बेवकूफी होगी। घर के बाद बच्चा स्कूल में जीवन के नए पाठ सीखने जाता है। नब्बे प्रतिशत गांवों में बसने वाले भारत के स्कूल खस्ताहाल हैं। बुनियादी सुविधाओं के साथ शिक्षक भी इन स्कूलों से नदारद मिलते हैं। इससे इस बात का सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि हम शिक्षा के क्षेत्र में शून्य से भी कितने पीछे हैं। इन दो जगहों से अधकचरा ज्ञान लेकर जब बच्चे कॉलेज में पहुँचते हैं तो वहां भी उन्हें ठगा जाता है। एक सुसंस्कृत और सभ्य- समाज के लिए हमारे प्रयास कितने खोखले और कछुआ चाल से चल रहे हैं। इसका सुबूत देश में पनप रहे क्षेत्रवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याओं से मिल जायेगा। इन सबसे ज्यादा जि़म्मेदारी हमारी खुद की बनती है। अगर हर नागरिक अपना काम ईमानदारी से करे तो आधी समस्याएं स्वत: हल हो जाएँगी।