गुरुवार, 17 नवंबर 2011
मंगलवार, 15 नवंबर 2011
तमाशा जारी है...
एक विज्ञापन में बच्ची अपने पापा से कार की मांग करती है.पापा उसे बैंक तक ले जाते हैं और बताते हैं कि कार उसे बैंक देगा. यानि की अब पापा की जगह बैंक ने ले ली है.ये विज्ञापनों का मायाजाल ही है जो हमारे खाने-पीने और पहनने से लेकर रिश्तों तक कि नयी परिभाषा गढ़ रहा है.विज्ञापनों ने भारतीय रसोई में घुसपैठ करके मैगी संस्कृति की नयी शुरुआत काफी पहले कर दी थी.हम वही देखते और सोचते हैं जो विज्ञापन हमें दिखाना चाहते हैं.और मज़े की बात यह है कि ये विज्ञापन कम्पनियाँ हमारी जेबें ढीली करके अच्छा मुनाफा कमा रही हैं.सिर्फ यही नहीं ये विज्ञापन हमारी मानसिकता में थोड़ा ही सही बदलाव ला रहे हैं.एक दूरसंचार कंपनी के नए विज्ञापन को ही ले लीजिये जो ग्राहकों को थोड़े में ही ज्यादा बात की गारंटी डरता है.हम भारतीयों की मानसिकता हमेशा से ही थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत वाली रही है.अगर आने वाले दिनों में हम भी ज्यादा की चाहत रखने लगें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.ये अपने शिकार (यहाँ ग्राहक को शिकार कहना ही ज्यादा उपयुक्त होगा)को बड़ी सावधानी से पहचानते हैं और फिर ऐड कम्पनियाँ अपने तरकश के सारे तीर छोड़ देती हैं ग्राहकों को रिझाने के लिए.ये इन विज्ञापनों का ही कमाल होता है की ग्राहक को रिन सफेदी के दाग भी अच्छे लगने लगते हैं. रिन सफेदी का ही एक और विज्ञापन है जो हमें चमकते कपड़ों के दम पर सिर उठाकर जीना सिखाता है. लेकिन इसे बनाने वाला रचनात्मक दिमाग शायद ये भूल जाता है की जिस देश के लोगों को एक वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं वो महंगा सर्फ़ अपनी फटी धोती को धुलने के लिए कहाँ से लायेंगे. ये विज्ञापनी महिमा है जिसमें ग्राहक फंसता चला जाता है. हमारे ज़हन में ये दो सेकेंड के विज्ञापन इतनी बार ठोंके जाते हैं कि हमें ठंडा मतलब कोका कोला और वनस्पति घी मतलब डालडा ही समझ आता है.
विज्ञापनों की दुनिया कुछ नए प्रयोग भी दिखाती है.रचनात्मकता का ऐसा पुट जो सास बहु टाइप्स टी.वी. सीरिअल्स से उकता चुके हमारे मन को मन को सुकून देते हैं.ज़रा याद कीजिये वोडाफोन के वो जूजू वाले ऐड जो बिना कुछ कहे कितना कुछ कहकर दर्शकों को बांध लिया करते थे.और भ्रष्टाचार पर तीखे व्यंग करते टाटा टी के विज्ञापन जो खिलने नहीं पिलाने की बात करते हैं.पप्पू के पास होने की बात हो या ज़बान पर ताला लगाने वाले सेंटर फ्रेश की इन विज्ञापनों ने एक नया चलन शुरू किया जिसका मकसद सिर्फ प्रोडक्ट बेचना भर नहीं रह जाता.आईडिया के विज्ञापन जो खुद की सेवाएं बेचने के साथ साथ अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का भी बखूबी वहन कर रहे हैं. फिर वो चाहे कागज की बर्बादी रोककर पेड़ बचने की बात हो या फिर सही उम्मीदवार को वोट देने की बात हो.ये सबको एक तराजू में तोलता है और कहता है की सब अपने नंबर से जाने जायेंगे.समानता की ऐसी तस्वीर रखता है जिससे हमारा समाज जाने कितने सालों से लड़ता रहा है.लेकिन बात फिर वहीँ आकर टिक जाती है की विज्ञापनों की दखलंदाज़ी हमारे जीवन में क्या इस हद तक होनी चाहिए? अगर हम टी.वी. और अख़बारों में ख़बरों व विज्ञापनों के अनुपात पर नज़र डालें तो बजारुपने की सारी कवायद समझ आ जाती है.ख़बरों और विज्ञापनों का 60/40 वाला अनुपात 40/60 में बदल गया है.साफ़ है अखबार विज्ञापनों के लिया ही हम खरीद रहे ख़बरों के लिए नहीं. ये किस्सा उन समाचारपत्रों का भी है जो सबसे अच्छे सबसे ज्यादा बिकने का दावा करते है.दुनिया भर के दामन को साफ़ करने वाला मीडिया अपने दामन की छीटों को किस साबुन से साफ़ करेगा.
लेकिन कुछ भी हो विज्ञापनों की इस सबसे ज्यादा बिकने की होड़ में फायदा कहीं न कहीं ग्राहकों को भी हो रहा है. कम कीमत में ज्यादा विकल्प उपभोक्ता के पास बने हुए हैं.तो कैडबरी के विज्ञापन की तरह उसे इस बात की चिंता नहीं सताती की अज महीने की कौन सी तारीख है.हर दिन सुहाना बनाने के लिए उपभोक्ता तैयार है.
विज्ञापनों की दुनिया कुछ नए प्रयोग भी दिखाती है.रचनात्मकता का ऐसा पुट जो सास बहु टाइप्स टी.वी. सीरिअल्स से उकता चुके हमारे मन को मन को सुकून देते हैं.ज़रा याद कीजिये वोडाफोन के वो जूजू वाले ऐड जो बिना कुछ कहे कितना कुछ कहकर दर्शकों को बांध लिया करते थे.और भ्रष्टाचार पर तीखे व्यंग करते टाटा टी के विज्ञापन जो खिलने नहीं पिलाने की बात करते हैं.पप्पू के पास होने की बात हो या ज़बान पर ताला लगाने वाले सेंटर फ्रेश की इन विज्ञापनों ने एक नया चलन शुरू किया जिसका मकसद सिर्फ प्रोडक्ट बेचना भर नहीं रह जाता.आईडिया के विज्ञापन जो खुद की सेवाएं बेचने के साथ साथ अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का भी बखूबी वहन कर रहे हैं. फिर वो चाहे कागज की बर्बादी रोककर पेड़ बचने की बात हो या फिर सही उम्मीदवार को वोट देने की बात हो.ये सबको एक तराजू में तोलता है और कहता है की सब अपने नंबर से जाने जायेंगे.समानता की ऐसी तस्वीर रखता है जिससे हमारा समाज जाने कितने सालों से लड़ता रहा है.लेकिन बात फिर वहीँ आकर टिक जाती है की विज्ञापनों की दखलंदाज़ी हमारे जीवन में क्या इस हद तक होनी चाहिए? अगर हम टी.वी. और अख़बारों में ख़बरों व विज्ञापनों के अनुपात पर नज़र डालें तो बजारुपने की सारी कवायद समझ आ जाती है.ख़बरों और विज्ञापनों का 60/40 वाला अनुपात 40/60 में बदल गया है.साफ़ है अखबार विज्ञापनों के लिया ही हम खरीद रहे ख़बरों के लिए नहीं. ये किस्सा उन समाचारपत्रों का भी है जो सबसे अच्छे सबसे ज्यादा बिकने का दावा करते है.दुनिया भर के दामन को साफ़ करने वाला मीडिया अपने दामन की छीटों को किस साबुन से साफ़ करेगा.
लेकिन कुछ भी हो विज्ञापनों की इस सबसे ज्यादा बिकने की होड़ में फायदा कहीं न कहीं ग्राहकों को भी हो रहा है. कम कीमत में ज्यादा विकल्प उपभोक्ता के पास बने हुए हैं.तो कैडबरी के विज्ञापन की तरह उसे इस बात की चिंता नहीं सताती की अज महीने की कौन सी तारीख है.हर दिन सुहाना बनाने के लिए उपभोक्ता तैयार है.
कहूँ कैसे
बात दिल में जो थी
उसे कहूँ कैसे?
इरादा न था कोई
बन गयी जो तस्वीर यूँ ही
भरने को उसमें रंग
वक़्त पर छोड़ दूं कैसे?
नदी हूँ मिल जाना है
एक दिन समंदर में ही
थामने को उसको
बांध मैं बनूँ कैसे?
माफ़ करना हमसफ़र नहीं
बन पाई हूँ अब तक
ख़ुशी जो तुझसे मिली
दर्द उसको कहूँ कैसे ?
ख़त जो लिखा न कभी
ढूंढकर पुरानी किताब से
एहसास वो शब्दों के
पढूं कैसे?
अनसुनी धुनों से सजी
नज़्म अधूरी ही है
बिन बात के उसे
लब गुनगुनाएं कैसे?
तमाशा कहती है दुनिया
अक्सर संवेदनाओं को
ढोंग शब्दों का रचकर
कोई कविता फिर से
लिखूं कैसे?
बात दिल में जो थी
कहूँ कैसे? -संध्या
उसे कहूँ कैसे?
इरादा न था कोई
बन गयी जो तस्वीर यूँ ही
भरने को उसमें रंग
वक़्त पर छोड़ दूं कैसे?
नदी हूँ मिल जाना है
एक दिन समंदर में ही
थामने को उसको
बांध मैं बनूँ कैसे?
माफ़ करना हमसफ़र नहीं
बन पाई हूँ अब तक
ख़ुशी जो तुझसे मिली
दर्द उसको कहूँ कैसे ?
ख़त जो लिखा न कभी
ढूंढकर पुरानी किताब से
एहसास वो शब्दों के
पढूं कैसे?
अनसुनी धुनों से सजी
नज़्म अधूरी ही है
बिन बात के उसे
लब गुनगुनाएं कैसे?
तमाशा कहती है दुनिया
अक्सर संवेदनाओं को
ढोंग शब्दों का रचकर
कोई कविता फिर से
लिखूं कैसे?
बात दिल में जो थी
कहूँ कैसे? -संध्या
शुक्रवार, 4 नवंबर 2011
तुम्हारा थामे
दूर तलक चलते जाने के
सपने हाथ
पिघलते सूरज की तरह
उतरती तुम मुझमें
जाड़े की सर्द हवाओं
की तरह तुम्हरी यादें
कंपा देतीं हैं मुझे
आज भी
याद नहीं किया करता
अब तुम्हारी बातें
गूंजती रहती है हर वक़्त
कानों में सुबह शाम
कानों में सुबह शाम
यादों के धुंधलके में
दिख जाती हो तुम
जैसे कोई तस्वीर हो बेनाम -संध्या
गुरुवार, 3 नवंबर 2011
बड़े हो अपने घर के तुम
फिर भी छोटू हो
ढाबे के
बड़ी कोठियों के
फैक्ट्रियों के
सुबह होती है तुम्हारी
कूड़े के ढेर में
आंखें मिलमिलाते हुए
सपने नहीं देखतीं
मेलों,रंगीन किताबों
और मंहगे खिलौनों के
ज़िन्दगी बसर होती है
doosron के fenke gaye
kachre पर
skool baig नहीं होता
तुम्हारी पीठ पर
बोझ जिम्मेदारियों का
ढोते हो
रोये थे न तुम
फूट फूटकर
जाना था जब काम पर
पहली बार
ढूंढ लेते हो रंग बचपन के
गैराज की कालिख में
rang बिरंगे गुब्बारों की जगह
तुम्हारी मुट्ठी में
बूट पोलिश का ब्रश
गाड़ियों के साफ़ करते शीशे
और टूटे हुए सपने कांच की
शीशियों के
छोटू हो तुम
हर नुक्कड़ के
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