गुरुवार, 29 नवंबर 2012

दिन भर की भाग दौड़
और जीवन की आपाधापी
ओह सुबह की चाय
फिर लंच
लो स्कूल की बस
छूट गयी बच्चों की
फिर लाज शरम का
पल्लू थामे
दौड़ो कि बस
छूट न जाये कहीं
ऑफिस में भी आराम कहां
ध्यान तो वहीं लगा
कि शायद रसोई में
कल की सब्जी ख़तम है
लौटती हूँ तो
बिखरे सामान के संग 
मन के कुछ कोने भी
समेटती जाती संग संग
और फ़िर रात को
चुपके से उठकर 
दबे पांव मैंने
पूजाघर की सबसे
ऊपर की अलमारी में
स्थापित कर दी कुछ यादें
न.. न..
तुम्हारी तस्वीर नहीं
तुम्हारा दिया हुआ
कुछ सामान
ताकि अलसुबह सबसे पहले उठकर
नवा सकूँ सिर अपना
कुलदेवता के बहाने ......................संध्या



1 टिप्पणी:

  1. आखिरी पंक्तियाँ मर्मस्पर्शी और बेहतरीन हैं।

    सादर

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