सोमवार, 19 नवंबर 2012

चुनावी तैयारियों के मायने

          
उत्तर प्रदेश के पिछले  चुनावों में रिकार्ड मतों से विजयी होकर सरकार बनाने वाली सपा सरकार आत्मविश्वास से लबरेज नजऱ आ रही है। यह आत्मविश्वास इसी से पता चलता है कि उसने बाकी पार्टियों से एक कदम आगे रहते हुए २०१४ के लोकसभा चुनावों के लिए अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है।  कुल ८० में से ५५ सीटों के प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी गयी है।  जिनमें से वर्तमान २२ सांसदों में से १८ को फिर से उम्मीदवार बनाया गया है।  इन प्रत्याशियों में से अधिकतर पूर्व सांसद,पूर्व विधायक और कुछ वर्तमान मंत्री और विधान सभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय भी सम्मिलित हैं जिन्हें डुमरियागंज से प्रत्याशी घोषित किया गया है।  सपा मुखिया की बहू डिम्पल यादव कन्नौज से, भतीजे धर्मेन्द्र यादव बदायूं सीट से और स्वयं सपा प्रमुख मुलायम मैनपुरी सीट से उम्मीदवार हैं।  जबकि परिवार के नए सदस्य रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव फिरोजाबाद सीट से राजनीति  में अपना भाग्य चमकाने की तैयारी में हैं।  गौरतलब है कि फिरोजाबाद को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पंचायत कहा जाता है।  इससे पहले डिम्पल यादव ने भी फिरोजाबाद की सीट से ही चुनाव लड़ा था पर वह कॉंग्रेस प्रत्याशी राज बब्बर से चुनाव हार गयी थीं।  अभी भी २५ प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला होना बाकी है।  सपा की और से इसे भले ही सामान्य घोषणा बताया जा रहा हो।  लेकिन राजनीतिक रूप से इसके गहरे निहितार्थ हैं।  कांग्रेस की समन्वय समिति की बैठक के ठीक दूसरे दिन यह घोषणा की गयी है।  यह भी कहा  जा रहा है कि सपा यह मानकर चल रही है कि लोकसभा चुनाव समय से पहले होने की उम्मीद है। जिसे ध्यान में रखकर वह कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहती।  कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली और अमेठी से अभी तक किसी उम्मीदवार की घोषणा नहीं की गयी है।  उधर मुलायम  सिंह यादव भी बार बार कार्यकर्ताओं को लोकसभा चुनाव की तैयारियों में अभी से जी जान से जुट जाने का आह्वान कर रहे हैं।  बसपा जिस तरह से चुनावी तैयारियों में लगी हुई है सपा के लिए यह जरूरी हो गया था और यह भी साबित करने की कोशिश में है कि सपा लोकसभा चुनावों को हलके में बिलकुल नहीं ले रही है।  अपनी राजनीतिक ताक़त को दिखने के लिए दोनों तरफ से रैलियां भी पिछले दिनों आयोजित की जा चुकी हैं।  २००९ के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी २२ सीटों पर जीत हासिल करने  में कामयाब हुई थी।  एस पी सुप्रीमों यह भंली भांति जानते हैं अगर केंद्र पर अपनी पकड़ और मजबूत करनी है तो कम से कम सीटों की संख्या और बढ़ानी होगी।  वैसे भी सपा कॉंग्रेस के लिए केंद्र में संकट मोचक की भूमिका लगातार निभाती आ रही है।  कॉंग्रेस की तरफ से जहाँ राहुल को अगुवा बनाकर लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारियां चल रही है।  वहीं सपा को यह ध्यान रखना होगा कि सिफऱ् उम्मीदवारों कि घोषणा कर देने भर से वह सफल नहीं हो सकती।  चूँकि उत्तर प्रदेश पूरे देश की राजनीति का केंद्र है।  केंद्र तक का पहुँचाने का रास्ता भी यहीं से होकर जाता है।  सपा उत्तर प्रदेश की सत्ता रूढ़ पार्टी है इसका फायदा उसे उठाना होगा और यह सब तभी संभव अहै जब अखिलेश सरकार अपने किये गए वादों पर पूरी तरह से अमल करे।  जिन दावों के दम पर अखिलेश मुख्यमंत्री की सीट तक पहुँचने में सफल हुए हैं उन्हें पूरा करने में विलम्ब न किया जाये।  हालाँकि कुछ महत्त्वपूर्ण और सराहनीय फैसलों के लिए इस युवा मुख्यमंत्री की चौतरफा तारीफ भी हुई है।  हाल ही में महिलाओं के लिए शुरू की गयी हेल्प लाईन उसी का एक हिस्सा है।  लेकिन ऐसे कई कार्य अधूरे पड़े हैं जिनका संज्ञान अभी तक नहीं लिया गया है।  मसलन किसानों की समस्या।  उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या यहाँ की खऱाब कानून व्यवस्था है।  यूपी की कानून व्यवस्था दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है।  लोगों को न्याय के लिए इधर उधर भटकना पड़ता है।  सरकार के कुछ मंत्रियों पर कानून हाथ में  लेने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं।  मंत्रियों की खऱाब छवि सपा को चनावों में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है।  अगर इस पर कोई निर्णय जल्द न लिया गया तो लोकसभा चुनावों में गंभी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।  इन सब समस्याओं को जब तक नहीं सुलझाया जायेगा, आशातीत सफलता नहीं प्राप्त हो सकती।  यूपी के मतदाताओं का दिल जीतने के लिए ज़रूरी है कि उनके लिए राहतकारी फैसले लिए जायें साथ ही साथ उन्हें पूरा करने के लिए युद्ध स्तर  पर काम किया जाये।  दूसरी बात जिस तरह से अखिलेश की ब्रांडिंग एक युवा मुख्यमंत्री के रूप में बड़े जोर शोर से की गयी थी उसके अनुरूप उनकी सरकार ऐसा कोई प्रदर्शन नहीं कर पायी है।  मुख्यमंत्री को अपने निर्णयों में भी वही तेजी और ईमानदारी लानी होगी जिससे आम जनता का विश्वास उनपर बना रहे।
                                                                           - संध्या यादव

2 टिप्‍पणियां:

  1. भैंसों के आगे बीन नहीं बजायी जाती, इन नेताओं को सुधरो और सुधारो वाले सुझाव-प्रस्ताव रास नहीं आते।
    सनसनाते हुए चाबुक की तरह इनकी पीठ पर पड़ने वाले तीखे व्यंगात्मक शाब्दिक प्रहार ही इनकी मोटी खाल पर थोडा बहुत प्रभाव, वो भी कभी-कभी ही डाल पाते हैं

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  2. भैंसों के आगे बीन नहीं बजायी जाती। इन नेताओं को सुधरो और सुधारों का सन्देश देने वाले सुझाव रास नहीं आते
    सनसनाते हुए चाबुक की तरह इनकी पीठ पर पड़ने वाले तीखे-तल्ख व्यंगात्मक शाब्दिक प्रहार इन पर जब कभी थोडा बहुत प्रभाव छोड़ने में सफल हो पाते हैं।

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