गुरुवार, 3 नवंबर 2011

बड़े हो अपने घर के तुम
फिर भी छोटू हो
ढाबे के
बड़ी कोठियों के 
फैक्ट्रियों के 
सुबह होती है तुम्हारी
कूड़े के ढेर में
आंखें मिलमिलाते हुए 
सपने नहीं देखतीं
मेलों,रंगीन किताबों 
और मंहगे खिलौनों के 
ज़िन्दगी बसर होती है
doosron के fenke gaye
kachre पर 
skool baig नहीं होता 
तुम्हारी पीठ पर  
बोझ जिम्मेदारियों का 
ढोते हो
रोये थे न तुम
फूट फूटकर 
जाना था जब काम पर 
पहली बार 
ढूंढ लेते हो रंग बचपन के
गैराज की कालिख में
rang बिरंगे गुब्बारों की जगह
तुम्हारी मुट्ठी में 
बूट पोलिश का ब्रश  
गाड़ियों के साफ़ करते शीशे
और टूटे हुए सपने कांच की
शीशियों के
छोटू हो तुम
हर नुक्कड़ के


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1 टिप्पणी:

  1. उसकी किस्मत मे यही है ...उसे दरकार है आगे बढ्ने की ....पर हम मे से कोई उसकी जिंदगी संवारना ही नहीं चाहता।

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