मंगलवार, 8 मार्च 2011

जहाँ रोज पोलिश होती है जिंदगी


                       ये  दौलत  भी  ले  लो  ये  शोहरत  भी  ले  लो .........मगर  मुझको  लौटा  दो  बचपन  का  सावन  वो  कागज  की  कश्ती , वो  बारिश   का  पानी हर  कोई  अपने  बचपन  की  यादों  में  लौटना  चाहता  है ,क्योंकि  बचपन  के  दिन  सबसे  हसीं  होते  हैं . न  किसी  की  चिंता ,दुनियादारी  से  बेखबर  हम  अपनी  ही  दुनिया  में  खोये  रहते  हैं . वो  दुनिया  जिसमे  मिटटी  के  घरौंदे ,दोस्तों  का  साथ ,टॉफी ,कागज  की  नाव ,छुपन -छुपायी  के  खेल , ज़रा -ज़रा  सी  बात  पे  कुट्टी  कर  लेना ,कंचे  खेलना , तितली पकड़ना ,स्कूल का  वो  पहला  दिन और  न  जाने  कितना  कुछ .
                                                                                           आज   राह  चलते  अचानक  फिर  उसी  बचपन  से  मुलाक़ात  हो  गयी  है . पर  जाने  क्यूँ  ये  वैसा  नहीं  लग  रहा  है ? जिंदगी  की  भागमभाग  में  जब  सड़क  किनारे  अपनी  दुकान  सजाये  इस  बचपन  पर  नज़र  पड़ी  तो  खुद  को  रोक  नहीं  पाई . हर  खबर  से  बेखबर  इसने  अपने  चारों  ओर  एक  अलग  सी  दुनिया  बसा  राखी  है . जूते -चप्पलों  घिरा  ये  बचपन  जूते  गांठने  के  साथ -साथ  जिंदगी  के  झोल  को  भी  सिलने  की  कोशिश  में   है . तो  दूसरी  ओर  ग्राहकों  के  काम   भी  लगे  हाथ  निपटाता  जाता  है . उससे  बातें  करके  महसूस  हुआ  कि , मनीष  असल   जिंदगी  में  भी  मनीषी  है ; परिस्थितियों  का , गरीबी  का  और  पेट  का . जिंदगी  इतनी  बेरहम  हुयी  है  कि  रूखापन  उसकी  बातों  में  साफ़  झलकता  है . लेकिन  प्यार  और  सहानुभूति  से  बात  करने  पर  सब  कुछ  बड़ी  सहजता  से  बयां  करता  जाता  है . पुरनियाँ  रेलवे  क्रोसिंग  के  पास  रहने  वाला  मनीष  बूट -पोलिश  करता  है . पिता  की  बीमारी  ने  उसे  ऐसा  करने  के  लिए  मजबूर  किया .चार  भाई  बहनों  में  सबसे  बड़ा ; छोटा  सा  मनीष  पूरे   घर  की  जिम्मेवारी  संभाले  हुए  है .डालीगंज  स्थित  राष्रीय   बालश्रम  विकास  विद्या  मंदिर   में  तीसरी  क्लास  में  पढता  है . उसका  मन  पढने  में  लगता  है  इसका  सबूत  वो  झट  से  तीन  और  चार  का  पहाडा  सुनाकर  देता  है . सुबह  सात  से  दोपहर  बारह  बजे  तक  की  स्कूली  पढाई  के बाद  खुलती  है  मनीष  की  जिंदगी  की  किताब  जो  इतनी  आसान  नहीं . आगे  यही  काम  करना  चाहते  हो  या  कुछ  और ? मेरे  इस  सवाल  पर  वह  बहुत  साढ़े  हुए  दार्शनिक  की  तरह  जवाब  देता  है कि -"बूट  पोलिश  भी  काम  है  कोई  चोरी  नहीं . हम  ऐसा  पेट  के  लिए  करते  हैं  ख़ुशी  में  नहीं . पढ़ -लिख  कर  बड़ा  आदमी  कौन  नहीं  बनना  चाहता , लेकिन  किस्मत  जहाँ  ले जाए .अभी से  ,क्या  बता  दे ." न  जाने  किस  अपनेपन  से  मनीष  मुझे  बताता  है  कि  आज  उसके  छोटे   भाई  ने  अपनी  आँख -मुंह  को  feviquik से  बुरी  तरह  चिपका  लिया  है  और उसके  बाबा   उसे  डाक्टर के  पास  लेकर  गए  हैं . इतना  कहते - कहते  वो  लगभग  रो  पड़ता  है  . मेरे  ये  समझाने  पर  कि  उसका  भाई  ठीक  हो  जायेगा  वो  खुश  हो  जाता  है . जब  मैं  उसकी तारीफ  करते  हुए  कहती  हूँ  कि  मुझसे  जूते  इतने  नहीं  चमकते , तो  नसीहत  देते  हुए  कहता  है  कि  इसमें  जोर  लगाना  पड़ता  है .
                                                                                  'बाकी  पैसे  बाद  में  ले  लीजियेगा ' कहकर  वो  हक  से मुस्कुरा  देता  है  और  फिर  से  अपने  काम  में  लगन  से  जुट  जाता  है ,बिना  इसकी  परवाह  किये  कि  कौन  सा  काम  है .शायद  उसे  बचपन  का  साथी  मिल  गया  है . ये  सिर्फ  एक  मनीष  की  कहानी  नहीं  है . ऐसे  लाखों  मनीष  हैं  जिनके  पास  बचपन  की  यादों  के  नाम  पर  सिर्फ  गरीबी , पेट  की  भूख ,जिंदगी  की  परेशानियाँ और   कडवी  यादें  हैं . उनके  पास  न  तो  उस  पहले  स्कूल   बैग  और  ड्रेस  का  उत्साह  है , न  त्योहारों  की  ख़ुशी  और  न  ही  बचपन  की  बेफिक्री  भरी  हंसी  है . वहां  से  जाते  समय  मुझे  किसी  कवि  की  ये  पंक्तियाँ  याद  आ  रही  थी -'राष्ट्रगान   में  बैठा  भला  वह  कौन  सा  भाग्यविधाता  है , फटा  सुथन्ना  पहिने  जिसके  गुण  हरिच्रना   गाता  है '


                                                        



































4 टिप्‍पणियां:

  1. मनीष असल जिंदगी में भी मनीषी है ; परिस्थितियों का , गरीबी का और पेट का . जिंदगी इतनी बेरहम हुयी है कि रूखापन उसकी बातों में साफ़ झलकता है . लेकिन प्यार और सहानुभूति से बात करने पर सब कुछ बड़ी सहजता से बयां करता जाता है . पुरनियाँ रेलवे क्रोसिंग के पास रहने वाला मनीष बूट -पोलिश करता है . पिता की बीमारी ने उसे ऐसा करने के लिए मजबूर किया


    किस्सागो वाली शैली में अच्छा फीचर है कुछ चित्र लगा के इसे और संवार दें तो पढ़ने का मज़ा दुगुना हो जाए बधाई

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  2. सहजता से पिरोये हुए सहज शब्दों की श्रृंखलाओं से भावनाओं का सुंदर चित्रण !! मुकुलजी के शब्दों की प्रेरणा अवश्य आगे की रचनाओं में समाहित करे संध्या !! बधाई !!

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